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शनिवार, 29 मार्च 2025

🐦‍⬛पपीहे की पुकार: विरह, प्रतीक्षा और प्रेम की शाश्वत गाथा! 🪶

पपीहा (चातक) पक्षी 
भारतीय उपमहाद्वीप के आकाश में गूँजने वाली मधुर ध्वनियों में यदि कोई सबसे अधिक करुण, सबसे अधिक प्रतीक्षारत और सबसे अधिक गूढ़ अर्थों से भरी है, तो वह पपीहे का स्वर है। यह स्वर मानो किसी बिछड़े हुए प्रेमी की पुकार हो, जो अनंत आकाश की गोद में खोए अपने प्रियतम को आवाज़ देता हो। यह पक्षी अपनी विलक्षण प्रकृति के कारण न केवल लोकमानस में बल्कि साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण में भी विशेष स्थान रखता है।

पपीहा, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Hierococcyx varius कहते हैं, भारत के घने वनों, उपवनों और गाँवों में पाया जाता है। यह वही पक्षी है, जिसे भारतीय मानस ने वर्षा ऋतु का अग्रदूत कहा है। जैसे ही आकाश में काले बादल उमड़ने लगते हैं, इसकी कुहू-कुहू ध्वनि वातावरण में गूंज उठती है, मानो किसी विरहिणी के मन की व्यथा अभिव्यक्त कर रही हो। लोककथाओं में इसे अमृत की बूँद के लिए तरसने वाला पक्षी कहा गया है, जो केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा की पहली बूँद को ही ग्रहण करता है। यह प्रतीक है संकल्प और आदर्श की पराकाष्ठा का, एक ऐसे पथिक का जो केवल अपने उच्चतम लक्ष्य के लिए तत्पर है।

अक्सर इसे कोयल के समान समझने की भूल की जाती है, किंतु दोनों भिन्न प्रजातियाँ हैं। कोयल (Eudynamys scolopaceus) गहरे काले रंग की होती है और उसकी 'कू-कू' ध्वनि वसंत का संकेत देती है, जबकि पपीहा भूरे रंग का होता है और उसकी करुण पुकार 'पियू-पियू' या 'पियू कहे' वर्षा ऋतु में गूँजती है। जहाँ कोयल प्रेम और उल्लास की प्रतीक है, वहीं पपीहा विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक माना जाता है।

भारतीय काव्यधारा में पपीहा प्रेम, वियोग और प्रतीक्षा का प्रतीक बनकर उभरा है। भक्तिकाल के संत कवियों ने इसे आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी का प्रतीक माना। मीराबाई की भजनमालाओं में इसकी ध्वनि साधक के अंतःकरण में उठते विरह-भाव को स्वर देती है। सूरदास की कविताओं में यह गोपियों के हृदय की व्याकुलता का पर्याय बनता है। आधुनिक हिंदी कविता में महादेवी वर्मा ने इसे स्त्री हृदय की अनुगूंज के रूप में उकेरा है। प्रसिद्ध साहित्यकार हज़ारी प्रसाद द्विवेदी पपीहे को प्रतीक्षा और समर्पण की पराकाष्ठा का प्रतीक मानते थे। उनके अनुसार, "पपीहा केवल एक पक्षी नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का वह अंश है, जो प्रेम और अनुराग की परिधि में विचरता है। इसकी ध्वनि हमारी परंपराओं में गूँजती है।"¹

पपीहा मानो प्रतीक्षा की भाषा है, जो न केवल प्रेम की अभिव्यक्ति करता है, बल्कि संयम, एकनिष्ठता और समर्पण का भी प्रतीक बन जाता है। भारतीय संस्कृति में पपीहे का उल्लेख केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। लोकगीतों में यह उस प्रिय की याद दिलाने वाला स्वर है, जो दूर परदेश गया है और जिसकी प्रतीक्षा में नायिका सावन के हर दिन को आंसुओं में गिन रही है। यह स्वर किसी व्याकुल हृदय के अधीर प्रेम का प्रतीक है, जो हर आहट में अपने प्रियतम को खोजता है। लोककथाओं में इसे सच्चे प्रेम और तपस्या के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है।

"बूंद-बूंद को तरसे प्यासा, स्वाति जल ही पीता, बिछुड़न की पीर में खोया, नभ को ताके रीता।"

महाकवि कालिदास ने ऋतुसंहार में पपीहे की पुकार को विरहिणी की वेदना के समान बताते हुए लिखा है कि यह पक्षी प्रेम की तीव्रता और एकनिष्ठता का अद्वितीय उदाहरण है। उनके अनुसार, "पपीहे की पुकार उस अनंत प्रतीक्षा का प्रतीक है, जिसे केवल प्रेम की गहन अनुभूति ही समझ सकती है।"² किन्तु आज यह पक्षी संकट में है। जंगलों की कटाई, कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग और जलवायु परिवर्तन इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके हैं। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने कहा था, "प्रकृति की हर ध्वनि एक भाषा है, और पपीहे की करुण पुकार हमें यह बताने के लिए पर्याप्त है कि प्रकृति संकट में है। हमें इसे बचाने के लिए तुरंत प्रयास करने होंगे।"³

इसके संरक्षण के लिए हमें प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना होगा, वृक्षारोपण को बढ़ावा देना होगा और जैविक कृषि को अपनाना होगा। यह केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक ऐसा अंश है, जिसे बचाना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है। पपीहे की करुण पुकार केवल एक पक्षी की आवाज़ नहीं, बल्कि मानव हृदय की गहनतम अनुभूतियों का प्रतीक है। इसकी पुकार हमें प्रेम, प्रतीक्षा और समर्पण की गूढ़ भाषा सिखाती है। जब तक यह स्वर हमारे जंगलों में गूंजता रहेगा, तब तक प्रेम और प्रतीक्षा की इस शाश्वत गाथा का अस्तित्व बना रहेगा।

संदर्भ:

  1. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, अशोक के फूल, 1955। 
  2. कालिदास, ऋतुसंहार, तृतीय सर्ग। 
  3. सलीम अली, द बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स, 1941।

शुक्रवार, 28 मार्च 2025

🌿 प्राकृतिक चिकित्सा: स्वस्थ जीवन जीने की कला 🌞

बिना दवा प्राकृतिक चिकित्सा 
आजकल डॉक्टर भी अब दवा के साथ-साथ ताजी हवा लेने, धूप सेंकने, जंगल की सैर, समुद्र किनारे टहलने और मिट्टी में खेलने जैसी चीज़ों की सलाह देने लगे हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा एक ऎसी प्राचीन और वैज्ञानिक पद्धति है, जो बिना दवाओं के प्रकृति के नियमों का पालन करके स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने पर बल देती है।
यह चिकित्सा पद्धति केवल शरीर को ठीक करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने में भी सहायक होती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अब यह स्वीकार करने लगा है कि दवाओं के साथ-साथ प्रकृति के सान्निध्य में रहना, धूप सेंकना, खुली हवा में सांस लेना, पर्वतीय क्षेत्रों का भ्रमण करना, जंगल की सैर करना, पार्क में प्राणायाम करना, समुद्र किनारे टहलना और बच्चों को मिट्टी में खेलने देना – ये सभी स्वास्थ्य लाभ के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

मनुष्य का जन्म प्रकृति की गोद में हुआ है और मृत्यु के उपरांत उसका शरीर प्रकृति के पंचतत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—में विलीन हो जाता है। जब तक मनुष्य इन पंचतत्वों के नियमों का पालन करता है, तब तक वह स्वस्थ रहता है, लेकिन जब वह प्रकृति से विमुख होकर कृत्रिम जीवनशैली अपनाने लगता है, तब रोगों का शिकार हो जाता है। यह स्पष्ट है कि "प्राकृतिक नियमों के उल्लंघन करने का दंड ही बीमारी है।" यदि हम प्रकृति के अनुरूप जीवन नहीं जीते, तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और हमें अनेक शारीरिक व मानसिक समस्याएँ घेर लेती हैं।

यह मेरा व्यक्तिगत मत है कि "जो प्रकृति से जुड़े नहीं हैं, वे 'अज्ञानी' हैं।" जो प्रकृति हमारे जीवन का आधार है, जिसे खोजने के लिए वैज्ञानिक चंद्रमा और मंगल जैसे ग्रहों तक भटक रहे हैं, यदि हम उसी प्रकृति को नहीं समझ पाए, जो हमें जल, वायु, आवास और भोजन प्रदान करती है, तो हम आधुनिकता के बावजूद भी अज्ञानी और अनपढ़ के समान हैं। वास्तव में, शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने परिवेश और जीवनदायिनी प्रकृति को समझना और उसके अनुसार जीवन जीना भी है। प्रकृति की उपेक्षा कर यदि हम स्वयं को शिक्षित मानते हैं, तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी।

प्राकृतिक चिकित्सा इस तथ्य पर आधारित है कि हमारे शरीर में स्वयं को ठीक करने की स्वाभाविक शक्ति होती है। यदि हम इसे सही वातावरण, शुद्ध भोजन और संतुलित जीवनशैली दें, तो यह बिना किसी बाहरी सहायता के अपने आप स्वस्थ हो सकता है। अस्वास्थ्यकर खान-पान, व्यायाम की कमी, तनाव और कृत्रिम जीवनशैली ही रोगों का मूल कारण हैं। प्राकृतिक चिकित्सा इन समस्याओं का समाधान देती है और दवाओं के बिना भी रोगों को दूर करने की क्षमता रखती है। सूर्य स्नान, जल चिकित्सा, वायु स्नान, योग, प्राणायाम और प्राकृतिक आहार से हम शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं।

धूप और ताजी हवा का हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सूर्य की किरणें शरीर में विटामिन-डी का निर्माण करती हैं, जिससे हड्डियाँ मजबूत होती हैं और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। प्रातःकालीन ताजी हवा लेने से फेफड़े स्वस्थ रहते हैं और मानसिक तनाव कम होता है। इसी प्रकार, जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों की सैर करने से शुद्ध ऑक्सीजन प्राप्त होती है और मन को शांति मिलती है। समुद्र तट पर टहलना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है, क्योंकि समुद्री हवा में मौजूद खनिज तत्व श्वसन तंत्र और त्वचा के लिए लाभदायक होते हैं।

बच्चों को मिट्टी में खेलने देना भी एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक उपचार है। मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक बैक्टीरिया बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं और उन्हें एलर्जी, अस्थमा तथा अन्य प्रतिरक्षा संबंधी समस्याओं से बचाते हैं। दुर्भाग्यवश, आधुनिक समाज में माता-पिता बच्चों को स्वच्छता के नाम पर मिट्टी से दूर रखते हैं, जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इसी तरह, प्राकृतिक आहार और शुद्ध जल का सेवन भी स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। फलों, सब्जियों, अंकुरित अनाज और प्राकृतिक पेय पदार्थों का सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है, और शुद्ध जल पीने से शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं, जिससे पाचन-तंत्र दुरुस्त रहता है।

प्राकृतिक चिकित्सा केवल एक उपचार विधि नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। आधुनिक जीवनशैली के कारण उत्पन्न होने वाली बीमारियों से बचने के लिए हमें प्रकृति की ओर लौटना होगा। भारतीय डॉक्टर भी अब दवा के साथ-साथ प्राकृतिक चिकित्सा के लाभों पर बल दे रहे हैं। यदि हम प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करें, तो स्वस्थ, आनंदमय और संतुलित जीवन प्राप्त कर सकते हैं। सही मायनों में, प्रकृति ही हमारी सबसे बड़ी चिकित्सक है।
नई शब्दावली  
  1. प्राकृतिक चिकित्सा – Naturopathy

  2. पद्धति – Method/System

  3. स्वास्थ्य लाभ – Health Benefits

  4. संतुलन – Balance

  5. आत्मा – Soul

  6. सान्निध्य – Proximity/Closeness

  7. भ्रमण – Excursion/Tour

  8. प्राणायाम – Breathing Exercise (Pranayama)

  9. विलीन – Merged/Dissolved

  10. विमुख – Turned away/Indifferent

  11. कृत्रिम – Artificial

  12. रोग प्रतिरोधक क्षमता – Immunity

  13. अज्ञानी – Ignorant

  14. आवास – Shelter/Habitat

  15. परिवेश – Environment/Surroundings

  16. उपेक्षा – Neglect

  17. स्वाभाविक शक्ति – Natural Healing Power

  18. संतुलित जीवनशैली – Balanced Lifestyle

  19. अस्वास्थ्यकर – Unhealthy

  20. सूर्य स्नान – Sun Bathing

  21. जल चिकित्सा – Hydrotherapy

  22. वायु स्नान – Air Bathing

  23. मानसिक तनाव – Mental Stress

  24. श्वसन तंत्र – Respiratory System

  25. प्रतिरक्षा संबंधी – Immunological

  26. विषैले तत्व – Toxins

  27. पाचन-तंत्र – Digestive System

  28. जीवन जीने की कला – Art of Living

  29. आनंदमय – Joyful/Blissful

  30. चिकित्सक – Healer/Physician

सोमवार, 24 मार्च 2025

❇️ गन्ने की मिठास और भारत की पहली महिला वनस्पति वैज्ञानिक

🌿 जितने मीठे गन्ने का आप स्वाद ले रहे हैं, हमारे भारतीय गन्ने पहले ऐसे न थे! 🍬

भारत की पहली महिला वनस्पति वैज्ञानिक
कल्पना कीजिए कि आप एक मीठी चाय की चुस्की ले रहे हैं या गुड़ से बनी कोई स्वादिष्ट मिठाई खा रहे हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय गन्ना इतना मीठा क्यों है? क्या यह हमेशा से ऐसा था? नहीं! यह संभव हुआ एक ऐसी महिला वैज्ञानिक की मेहनत से, जो पौधों की भाषा समझती थीं और जिन्होंने भारत की चीनी को ज्यादा मीठा बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह कहानी है डॉ. ई.के. जानकी अम्मल की, जो भारत की पहली महिला वनस्पति वैज्ञानिक थीं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि विज्ञान सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को भी बदल सकता है। डॉ. जानकी अम्मल का जन्म 4 नवंबर 1897 को केरल के थलास्सेरी में हुआ था। उनके पिता शिक्षा प्रेमी थे और यही कारण था कि बचपन से ही जानकी अम्मल में पढ़ाई के प्रति विशेष रुचि थी। उन्होंने चेन्नई के क्वीन मेरी कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज, मद्रास से वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई की। उनकी लगन और मेहनत ने उन्हें अमेरिका के पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय तक पहुँचा दिया, जहाँ उन्होंने 1931 में डॉक्टरेट (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की।

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय किसान विदेशी गन्ने की प्रजातियों पर निर्भर थे, क्योंकि उनमें अधिक मिठास थी। इससे भारतीय कृषि कमजोर हो रही थी। लेकिन जानकी अम्मल ने ‘सैक्रम बर्बेरी’ नामक भारतीय गन्ने की प्रजाति पर शोध किया और इसे अधिक मीठा बनाने में सफलता प्राप्त की। उनकी इस खोज ने भारत को चीनी उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया और आज हम जिस मीठे गन्ने से गुड़, खांड, और चीनी बनाते हैं, उसमें कहीं न कहीं डॉ. जानकी अम्मल की मेहनत शामिल है।

गन्ने के अलावा उन्होंने नींबू, बैंगन, काली मिर्च और चावल जैसी फसलों की आनुवंशिक संरचना पर भी अध्ययन किया। वे रॉयल हॉर्टिकल्चर सोसाइटी, लंदन में काम करने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक बनीं। लेकिन विदेश में सम्मान और उच्च पद मिलने के बावजूद, वे अपने देश की सेवा करना चाहती थीं। 1951 में, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विशेष आमंत्रण पर वे भारत लौट आईं और भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान परिषद (CSIR) से जुड़कर वनस्पति विज्ञान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

डॉ. जानकी अम्मल न केवल कृषि वैज्ञानिक थीं, बल्कि वे पर्यावरण संरक्षण की अग्रदूत भी थीं। उन्होंने जब देखा कि केरल में जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, तो उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई। वे मानती थीं कि विज्ञान का उद्देश्य केवल नई खोज करना नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना भी है। उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने 1957 में ‘पद्मश्री’ सम्मान प्रदान किया। उनके सम्मान में ‘जानकी अम्मल नेशनल अवार्ड’ भी स्थापित किया गया, जो पर्यावरण और जैवविविधता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को दिया जाता है।

डॉ. जानकी अम्मल का जीवन हमें यह सिखाता है कि कड़ी मेहनत और जिज्ञासा से कोई भी ऊँचाई हासिल की जा सकती है। आज जब विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण की चर्चा होती है, तब उनका नाम प्रेरणा के रूप में उभरता है। अगर आप भी विज्ञान में रुचि रखते हैं और प्रकृति के रहस्यों को समझना चाहते हैं, तो जानकी अम्मल की तरह नई चीजों की खोज करने और अपने देश के लिए कुछ बड़ा करने का सपना देख सकते हैं!

🗳️"पहला मतदान – लोकतंत्र की जीत" (कहानी)

अजय, जो इस साल 18 वर्ष का हुआ था, पहली बार मतदाता बना था। वह अपने पिता के साथ खेत में काम कर रहा था, तभी गाँव के चुनाव अधिकारी का संदेश आया – "सभी मतदाता अपने मतदान केंद्र पर पहुँचें और अपने मतपत्र या ईवीएम के माध्यम से मतदान करें। यह आपका अधिकार भी है और कर्तव्य भी।"
गाँव राजपुर में चुनावी माहौल था। चारों ओर चुनावी प्रचार की गूँज सुनाई दे रही थी। हर गली में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता लोगों को अपने प्रत्याशी के समर्थन में वोट देने की अपील कर रहे थे। गाँव के चौराहे पर बड़े-बड़े घोषणापत्र लगे थे, जिनमें हर दल अपनी योजनाओं का बखान कर रहा था।
अजय के मन में उत्सुकता जागी। उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, मतदान क्यों ज़रूरी है?"

पिता मुस्कराए और बोले, "लोकतंत्र की असली ताकत जनता में होती है। जब हम सही प्रत्याशी को चुनते हैं, तो हम अपनी सरकार स्वयं बनाते हैं। यही हमारी सरकारी पार्टी होती है। यदि हमें उनकी नीतियाँ पसंद नहीं आतीं, तो अगली बार हम विपक्षी दल को मौका दे सकते हैं।"

अजय को यह सब बहुत रोचक लगा। अगले दिन वह अपने दोस्तों के साथ गाँव के मतदान केंद्र पहुँचा। वहाँ पर लंबी कतार लगी थी। निर्वाचन आयोग की व्यवस्था चाक-चौबंद थी। चुनाव अधिकारी सबको समझा रहे थे कि गुप्त मतदान के तहत वोट डालें और किसी को न बताएं कि उन्होंने किसे वोट दिया।

जब अजय का नंबर आया, तो उसने उत्सुकता से ईवीएम पर अपनी पसंद के प्रत्याशी के सामने का बटन दबाया। मशीन ने ‘बीप’ की आवाज़ की, और उसके अंगूठे पर स्याही लगा दी गई। उसने गर्व से अपनी उंगली देखी और दोस्तों से कहा, "मैंने लोकतंत्र को मजबूत किया!"

चुनाव के बाद गणना शुरू हुई। पूरे गाँव में चर्चा थी कि कौन जीतेगा। शाम को चुनाव परिणाम घोषित हुए – अजय के चुने हुए प्रत्याशी ने बहुमत प्राप्त कर लिया और नई सरकार बनी। गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई।

अजय को अब समझ में आ गया था कि एक छोटे से वोट की कितनी बड़ी ताकत होती है। उसने अपने दोस्तों से कहा, "हर नागरिक को मतदान अवश्य करना चाहिए। यह सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है।"

गाँव में यह पहली बार था कि युवाओं ने इतने जोश से चुनाव में भाग लिया था। जनता में जागरूकता बढ़ी, और अगले चुनावों में और अधिक मतदाता आने लगे।

नारा"लोकतंत्र बचाना है, वोट डालने जाना है!"

सीखयह कहानी बताती है कि चुनाव, मतदान और लोकतंत्र हमारी ज़िंदगी में कितने महत्वपूर्ण हैं। हर वोट मायने रखता है, और हम सभी को अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए। 

नई शब्दावली नई शब्दावली
  • चुनावी प्रचार – Election Campaign
  • राजनीतिक दल – Political Party
  • प्रत्याशी – Candidate
  • घोषणापत्र – Manifesto
  • मतदाता – Voter
  • मतदान – Voting
  • मताधिकार – Right to Vote / Suffrage
  • मतदान अधिकारी – Polling Officer
  • मतदान पर्यवेक्षक – Polling Observer
  • चुनाव अधिकारी – Election Officer
  • मतदान केंद्र – Polling Booth
  • मतपत्र – Ballot Paper
  • ईवीएम – Electronic Voting Machine (EVM)
  • अधिकार – Right
  • कर्तव्य – Duty
  • लोकतंत्र – Democracy
  • सरकारी पार्टी – Ruling Party
  • विपक्षी दल – Opposition Party
  • निर्वाचन आयोग – Election Commission
  • गुप्त मतदान – Secret Ballot
  • स्याही – Ink (Indelible Ink used in voting)
  • गणना – Counting (Vote Counting)
  • चुनाव परिणाम – Election Results
  • बहुमत प्राप्त – Majority Win
  • सरकार बनी – Government Formation
  • जनता – Public / Citizen

रविवार, 23 मार्च 2025

🌙 चाँद के पार चलो: चन्द्रमा तक की एक काल्पनिक यात्रा🌍

आधुनिक शिक्षा प्रणाली और 64 कलाएँ: सर्वांगीण विकास की आवश्यकताा

एक सुनहरी सुबह, जब सूरज की किरणें धरती पर बिखर रही थीं, भारत के एक छोटे से शहर के स्कूल में हलचल मची थी। इसरो (ISRO - Indian Space Research Organisation) ने एक खास मिशन की घोषणा की थी - "चंद्रयान-प्रेरणा"। इस मिशन में पाँच उत्साही छात्रों - रिया, आरव, सौम्या, सिद्धांत और मान्या - को चन्द्रमा की सैर पर ले जाया जाना था। ये बच्चे भूगोल और अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति अपनी जिज्ञासा के लिए चुने गए थे। उनकी आँखों में सपने थे और मन में सवालों का अथाह समंदर। अंतरिक्ष यान तैयार था। इसरो के वैज्ञानिक डॉ. अनिल और डॉ. स्मिता बच्चों को समझा रहे थे, "ये यान चन्द्रमा तक 3,84,400 किलोमीटर की यात्रा करेगा। इसमें हमें तीन दिन लगेंगे।" आरव ने तुरंत पूछा, "लेकिन गुरुत्वाकर्षण हमें नीचे क्यों नहीं खींचेगा?" डॉ. स्मिता मुस्कुराईं और बोलीं, "अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण बहुत कम होता है। हमारा यान रॉकेट की श क्ति से पृथ्वी के गुरुत्व को पार कर लेगा।" बच्चों की आँखें चमक उठीं।

तीन दिन बाद, जब यान चन्द्रमा की सतह पर उतरा, बच्चों ने बाहर झाँका। चारों ओर धूसर मिट्टी, गहरे गड्ढे और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ दिखे। रिया ने उत्साह से कहा, "ये तो चंदा मामा की कहानियों से बिल्कुल अलग है!" डॉ. अनिल हँसे, "हाँ, चंदा मामा एक कविता है, पर असल चन्द्रमा एक उपग्रह है जो पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है। यहाँ न पानी है, न हवा, और न ही जीवन।" बच्चों ने अपने अंतरिक्ष सूट पहने और चन्द्रमा की सतह पर कदम रखा। कम गुरुत्वाकर्षण के कारण वे उछल-उछल कर चल रहे थे। सौम्या ने पूछा, "ये गड्ढे कैसे बने?" डॉ. स्मिता ने बताया, "ये उल्कापिंडों के टकराने से बने हैं। चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है, इसलिए उल्काएँ सीधे सतह से टकराती हैं।" सिद्धांत ने दूरबीन उठाई और बोला, "वहाँ देखो! क्या वो धरती है?" दूर नीला-हरा गोला चमक रहा था। डॉ. अनिल ने कहा, "हाँ, ये हमारा घर है। पृथ्वी का 71% हिस्सा पानी से ढका है, इसलिए ये नीली दिखती है।"

बच्चों ने आसपास देखा। मान्या ने चिल्लाकर कहा, "वो देखो! वह लाल गोला क्या है?" डॉ. स्मिता ने समझाया, "अरे! वह तो मंगल ग्रह है। इसका लाल रंग वहाँ की मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड की वजह से है।" आरव ने जोड़ा, "और वहाँ जो चमक रहा है, क्या वो बृहस्पति है?" डॉ. अनिल ने हामी भरी, "बिल्कुल! बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है, जो गैस से बना है।"चन्द्रमा पर चलते हुए बच्चे धरती को निहारते रहे। रिया ने कहा, "हमारी धरती कितनी सुंदर है! यहाँ से देखो तो लगता है, इसे बचाना कितना ज़रूरी है।" डॉ. स्मिता ने गंभीरता से कहा, "सही कहा। चन्द्रमा पर नदियाँ, जंगल या हवा नहीं है। हमारी धरती का हर पेड़, हर बूँद अनमोल है।"

वापसी की तैयारी करते हुए सिद्धांत ने पूछा, "क्या हम कभी चन्द्रमा पर घर बना सकते हैं?" डॉ. अनिल ने जवाब दिया, "शायद हाँ। लेकिन इसके लिए हमें ऑक्सीजन, पानी और ऊर्जा की व्यवस्था करनी होगी। विज्ञान इसे संभव बना सकता है।" जब यान वापस पृथ्वी की ओर बढ़ा, बच्चों के मन में चंदा मामा की कविताएँ नहीं, बल्कि चन्द्रमा का असल चेहरा बस गया था। उन्हें समझ आ गया था कि भूगोल और विज्ञान हमें ब्रह्मांड के रहस्य खोलने की चाबी देते हैं। धरती पर लौटते ही सौम्या ने कहा, "अब मैं वैज्ञानिक बनूँगी और अंतरिक्ष के और राज़ जानूँगी!" बाकी बच्चे भी मुस्कुराए, क्योंकि उनकी जिज्ञासा अब सपनों को पंख दे चुकी थी।

मंगलवार, 18 मार्च 2025

✨ चाँदी के लखनवी जूते: एक विलुप्त होती शाही परंपरा

बजट: देश का आर्थिक पहिया

जूतियाँ बनाता कारीगर 
सिंड्रेला की कहानी तो आपको याद ही होगी? उस कहानी में एक विशेष जूती उसकी पहचान और भाग्य बदलने का माध्यम बनी थी। पश्चिमी दुनिया में सबसे अच्छी जूती काँच की थी, लेकिन अगर यह कथा भारतीय पृष्ठभूमि पर होती, तो वह जूती शायद चाँदी की होती - 'कलात्मक नक्काशी से सजी, लखनऊ के कुशल कारीगरों के हाथों गढ़ी हुई।' लखनऊ, जो अपनी नफासत, तहज़ीब और दस्तकारी के लिए प्रसिद्ध है, वहाँ सदियों से 
चाँदी के जूते बनाए जाते रहे हैं। यह परंपरा अब विलुप्ति की कगार पर है, लेकिन कुछ समर्पित शिल्पकार इसे अब भी जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।


लखनऊ की शाही दस्तकारी: चाँदी के जूतों का इतिहास

सिंड्रेला की कहानी में जूती केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि पहचान, सौभाग्य और प्रेम का प्रतीक थी। पश्चिमी लोककथाओं में यह जूती काँच की थी, लेकिन अगर यह कथा भारतीय संदर्भ में देखी जाए, तो लखनऊ का चाँदी के जूते बनाने का पारंपरिक शिल्प इससे जुड़ता हुआ प्रतीत होता है। लखनऊ, जो अपनी नजाकत, तहज़ीब और बेजोड़ कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है, वहां सदियों से नगीने जड़े, हाथ से बनाए गए चाँदी के जूते एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं।

हाफिज मोहम्मद अशफाक और आफिया: एक अनमोल विरासत के संरक्षक

आज इस कला के बहुत कम कारीगर बचे हैं, लेकिन लखनऊ के हाफ़िज मोहम्मद अशफाक और उनकी बेटी आफिया इसे जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। अशफाक साहब दशकों से चाँदी की जूतियाँ बना रहे हैं, और अब उनकी बेटी आफिया भी इस हुनर को सीख रही हैं। उनका मानना है कि यह सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे बचाना आवश्यक है। चाँदी के जूते बनाने की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। पहले चाँदी को पिघलाकर उसकी पतली चादर बनाई जाती है, फिर उस पर हाथ से बारीक नक्काशी की जाती है। इस प्रक्रिया में कई दिन लगते हैं, और हर जोड़ी जूती एक अनोखी कृति होती है।

आधुनिकता के प्रभाव और कला का संघर्ष

फैशन के दौर में आज चाँदी के जूतों की माँग पहले जैसी नहीं रही। चमड़े, प्लास्टिक और मशीन से बने जूतों ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। पहले जहाँ नवाबों, राजाओं और धनिकों के लिए ये जूतियाँ बनाई जाती थीं, अब इनकी माँग केवल विशेष डिजाइनरों या संग्राहकों तक सीमित रह गई है। इसके अलावा, सस्ते विकल्पों और मशीन निर्मित उत्पादों के कारण यह हस्तकला विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई है। हालांकि, कुछ संगठनों और फैशन डिजाइनरों ने इस कला को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। अगर इसे वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जाए, तो यह न केवल भारत की हस्तकला को पहचान दिला सकता है, बल्कि उन कारीगरों को भी नई संभावनाएँ दे सकता है जो इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोते आए हैं।

निष्कर्ष

लखनऊ की चाँदी की जूतियाँ केवल एक फैशन स्टेटस नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। यह शिल्प नवाबी दौर से जुड़ा हुआ है और लखनऊ की विशिष्टता को दर्शाता है। हफीज मोहम्मद अशफाक और आफिया जैसे कारीगर अपने हुनर और समर्पण से इसे जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन बाजार की प्रतिस्पर्धा और बदलते फैशन के कारण यह कला संकट में है। यदि इस अनूठी कला को उचित संरक्षण और प्रोत्साहन मिले, तो यह केवल लखनऊ ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में भारत की सांस्कृतिक पहचान को नया आयाम दे सकती है। जैसा कि सिंड्रेला की जूती ने उसकी तकदीर बदली, वैसे ही लखनऊ के चाँदी के जूते इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।

शुक्रवार, 14 मार्च 2025

गंगा-जमुनी तहज़ीब: एकता के अनमोल रंग

गंगा-जमुनी तहज़ीब: एकता के अनमोल रंग

देवा शरीफ़ मस्जिद, बाराबंकी में होली के दीवानों ने दी एकता की मिशाल  
भारत की मिट्टी में गंगा और यमुना की धाराओं की तरह दो संस्कृतियाँ सदियों से साथ बहती आई हैं - हिंदू और मुस्लिम। इन दोनों का संगम ही इस देश की आत्मा को संजीवनी देता है। भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि एक ऐसी साझा विरासत का प्रतीक है जहाँ मंदिरों की घंटियाँ और मस्जिदों की अज़ानें एक साथ गूँजती हैं, जहाँ दीयों की रोशनी ईद की चाँदनी से मिलकर समूचे वातावरण को नूरानी बना देती है।

"मस्जिद ढाए, मंदिर ढाए, ढाए जो कछु दास,
  पर कभी न छोड़िए, तोड़े जो भाव विश्वास।"
                                                             — कबीर

किन्तु यह भी सत्य है कि हाल के वर्षों में इन आपसी रिश्तों में दूरियाँ बढ़ाने की कोशिशें की गई हैं। कभी मंदिर-मस्जिद के नाम पर राजनीति होती है, तो कभी त्योहारों के दौरान संदेह और शंकाओं के बादल घिरने लगते हैं। परंतु जो लोग इस गंगा-जमुनी तहज़ीब को जीते आए हैं, उनके लिए धर्म की सीमाएँ उतनी ही बेमानी हैं जितनी नदियों के लिए उनके तटों की दीवारें। बचपन में होली पर जब मोहल्ले के हर बच्चे के चेहरे पर रंग लगा होता था, तब कोई यह नहीं पूछता था कि यह हाथ किस धर्म के हैं। नमाज से पहले रंग खेलकर मियांइन टोला के बच्चे भी अपने हिंदू दोस्तों के साथ उसी मस्ती में डूबे रहते थे।

"खेलें हम होली ग़ैरों के संग, 
जैसे खेलें अपने के संग।"
                                           — अमीर खुसरो

उधर दिवाली की रात जब घर-घर दिए जलते थे, तो कई मुस्लिम परिवार अपने हिंदू मित्रों के साथ मिठाइयाँ बाँटते और उनके घरों में जाकर दीयों की रोशनी में शामिल होते।

मेरे पतिराम दादा अक्सर हमें कहानी सुनाया करते थे कि कैसे 1947 के दंगों के दौरान हमारे गाँव के हाफ़िज़ साहब ने मंदिर में छिपे हिंदू परिवारों को अपने घर ले जाकर शरण दी थी। बदले में कुछ वर्षों बाद जब उनके बेटे का निकाह था, तो पूरे गाँव ने मिलकर बारात का स्वागत किया, चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम। इस भाईचारे की भावना को कोई राजनीतिक साजिश खत्म नहीं कर सकती।

भारत का इतिहास गवाह है कि यहाँ ताजमहल जितना ही महत्वपूर्ण खजुराहो के मंदिर भी हैं। कबीर की दोहों में जितना हिंदू दर्शन समाया है, उतना ही इस्लामी सूफ़ीवाद भी।

"मोको कहां ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास रे,
ना तीरथ में, ना मूरत में, ना एकांत निवास रे।"
— कबीर

अमीर खुसरो ने हिंदवी में ऐसे गीत रचे जो आज भी दोनों समुदायों में समान रूप से गाए जाते हैं।

"छाप तिलक सब छीन ली, मोसे नैना मिलाइके।"
— अमीर खुसरो

अगर हम बॉलीवुड की बात करें, तो मोहम्मद रफ़ी के गाए भजन और लता मंगेशकर के गाए नात दोनों ही दिल को छू लेते हैं। राही मासूम रज़ा ने 'महाभारत' की पटकथा लिखी, तो प्रेमचंद ने 'ईदगाह' के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता को जीवंत किया। यह बताता है कि हमारी साझा संस्कृति किसी एक मज़हब की जागीर नहीं, बल्कि सभी की धरोहर है।

हमारी गलियों में अब भी चाय की दुकानों पर हिंदू और मुस्लिम बुज़ुर्ग एक साथ बैठकर गप्पें लड़ाते हैं। अब भी शादी-ब्याह के मौकों पर दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आते हैं। आज भी जब कोई मुसीबत आती है, तो सबसे पहले पड़ोसी ही काम आता है, चाहे वह किसी भी धर्म का हो।

पर सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी इस साझी विरासत को बचा पाएँगे? क्या हम अपने बच्चों को यह सिखा पाएँगे कि उनका धर्म इंसानियत से ऊपर नहीं? यदि हमें अपनी संस्कृति को संजोना है, तो हमें उन ताकतों को पहचानना होगा जो हमें बाँटने की कोशिश कर रही हैं।

"मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा।"
                                                  — इक़बाल

हमें यह स्वीकार करना होगा कि नफरत की राजनीति किसी एक धर्म को नहीं, बल्कि पूरे समाज को नुकसान पहुँचाती है। भारत की असली पहचान इसकी विविधता में छिपी है। यह वह देश है जहाँ कृष्ण की बांसुरी की धुन और बुल्ले शाह के कलाम एक साथ सुने जाते हैं। जहाँ गुरु नानक की वाणी और रहीम के दोहे एक ही धरती से उपजे हैं।

"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय,
     टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए।"
                                                          — रहीम

यह वह देश है जहाँ किसी अनाथ बच्चे को पनाह देने के लिए यह नहीं देखा जाता कि वह किस धर्म का है। अगर हमें अपने देश को सही मायनों में आगे बढ़ाना है, तो हमें अपनी जड़ों से जुड़ना होगा। हमें फिर से उसी बचपन की मासूमियत को अपनाना होगा, जहाँ दोस्ती धर्म से बड़ी थी और मोहब्बत मज़हब से ऊपर। तभी हम इस गंगा-जमुनी तहज़ीब को हमेशा जीवित रख पाएँगे।

"सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा,
हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा।"
                                                                 — इक़बाल
आप सभी को इंडीकोच की और से होली की हार्दिक शुभ कामना 💐 

मंगलवार, 11 मार्च 2025

भारतीय वस्त्र विज्ञान और सूती वस्त्र

भारतीय वस्त्र विज्ञान और सूती वस्त्र
प्राचीन भारत में वस्त्र केवल पहनावे का साधन नहीं थे, बल्कि उनका गहरा वैज्ञानिक, नैतिक और आध्यात्मिक महत्व भी था। भारतीयों ने सदियों पहले ही यह समझ लिया था कि कपास से बने सूती वस्त्र सबसे अधिक स्वास्थ्यवर्धक, आरामदायक और पर्यावरण-अनुकूल होते हैं।

ऊन और रेशम निकालने के हिंसक विधि  
भारत सदियों से वस्त्र निर्माण और वस्त्र विज्ञान में अग्रणी रहा है। यहाँ के लोगों ने न केवल विभिन्न प्रकार के वस्त्रों का विकास किया, बल्कि उनके निर्माण की नैतिकता, स्वास्थ्य और आराम के दृष्टिकोण से भी गहन अध्ययन किया। भारतीय परंपरा में  सूती वस्त्रों को सर्वोच्च स्थान दिया गया, जबकि रेशम और ऊन जैसे वस्त्रों को कई स्थान पर निषेध किया गया, विशेषकर धार्मिक और नैतिक कारणों से।

क्या आप जानते हैं जिस रेशम को ऐश्वर्य और राजसी ठाट-बाट का प्रतीक माना जाता है, इसकी निर्माण प्रक्रिया अत्यंत क्रूर और हिंसक होती है। दरअसल पारंपरिक रूप से रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम के कीड़ों को उनके कोकून (गूंथे हुए रेशे) से जीवित निकालकर उबाल दिया जाता है। इससे हजारों कीटों की निर्मम हत्या होती है, जिससे यह प्रक्रिया नैतिक दृष्टि से अनुचित ठहरती है। यद्यपि कुछ स्थानों पर अहिंसक रेशम (तसर, एरी, और मुगा) तैयार किया जाता है, फिर भी यह सीमित मात्रा में उपलब्ध है और महँगा होता है।

इसी प्रकार ऊनी वस्त्रों का निर्माण के लिए भेड़ों से ऊन प्राप्त किया जाता है। यद्यपि ऊन प्राप्त करने की प्रक्रिया आमतौर पर जानलेवा तो नहीं होती, लेकिन व्यावसायिक रूप से बड़े पैमाने पर भेड़ों की कटाई-छँटाई में अमानवीयता देखी गई है। पशुओं की जबरन ऊन उतारने से वे ने केवल कष्ट भोगते हैं और अपितु कई बार बीमार भी पड़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऊनी वस्त्र नमी को रोकते हैं, जिससे उनमें बैक्टीरिया और फफूँद पनप सकते हैं।

पारंपरिक भारतीय वेश में स्त्री-पुरुष  
भारत में प्राचीन काल से ही कपास उत्पादन और सूती वस्त्र निर्माण का ज्ञान रहा है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता में भी कपास से बने सूती वस्त्रों के प्रमाण मिले हैं। भारतीय कपास उद्योग इतना उन्नत था कि यूनान, रोम और अरब देशों तक भारतीय सूती वस्त्र निर्यात किए जाते थे। सूती वस्त्रों की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ इस प्रकार हैं। ये शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखते हैं। ये त्वचा को श्वसन का अवसर देते हैं, जिससे शरीर से पसीना आसानी से सूख जाता है और जलन या खुजली नहीं होती। त्वचा संबंधी रोगों के लिए कपास से बने सूती वस्त्र अत्यंत लाभदायक माने गए हैं। कपास से बने वस्त्र हल्के और कोमल होते हैं, जिससे ये हर प्रकार के मौसम में आरामदायक रहते हैं। गर्मियों में यह शरीर को ठंडा रखते हैं और सर्दियों में भी उचित परतों में पहनने से गर्माहट प्रदान कर सकते हैं।

भारतीय धार्मिक ग्रंथों में अहिंसा (अहिंसा परमो धर्मः) को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। कपास से बने सूती वस्त्रों का निर्माण किसी भी प्रकार की हिंसा से मुक्त होता है, जिससे यह नैतिक रूप से भी श्रेष्ठ ठहरते हैं। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि सूती और खादी वस्त्र पहनते थे, क्योंकि ये प्राकृतिक और सात्विक होते थे। कपास से बने वस्त्र जैव-नाशवान (Biodegradable) होते हैं और पर्यावरण पर इनका नकारात्मक प्रभाव नगण्य होता है। इसके विपरीत, ऊनी और रेशमी वस्त्रों के उत्पादन में जल और संसाधनों की अत्यधिक खपत होती है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन पैदा होता है।

सूती वस्त्र बनता बुनकर 
भारत का कपास उद्योग सदियों से लाखों किसानों और बुनकरों की आजीविका का स्रोत रहा है। पारंपरिक हथकरघा उद्योग में सूती वस्त्रों का महत्वपूर्ण योगदान है, जिससे स्थानीय कारीगरों को रोजगार मिलता है। भारतीयों ने वस्त्रों को केवल शारीरिक आवरण के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी परखा। उन्होंने यह समझा कि वस्त्र केवल दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि उनका स्वास्थ्य, समाज और पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। रेशम और ऊनी वस्त्रों की तुलना में कपास से बने सूती वस्त्र न केवल अधिक आरामदायक और स्वास्थ्यप्रद हैं, बल्कि वे नैतिकता और पर्यावरण की दृष्टि से भी सर्वोत्तम माने जाते हैं।

आज जब पूरी दुनिया सतत विकास (Sustainable Development) की ओर बढ़ रही है, तब भारतीयों का यह ज्ञान और भी प्रासंगिक हो गया है। भारतीय संस्कृति में सदियों पहले अपनाए गए अहिंसक, प्राकृतिक और स्वास्थ्यकर वस्त्र विज्ञान को पुनः अपनाने की आवश्यकता है। यही कारण है कि सूती और खादी वस्त्र न केवल भारतीय परंपरा के गौरव हैं, बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सर्वोत्तम हैं।

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

सौर ऊर्जा से रोशन गुवाहाटी स्टेशन: मेरी अविस्मरणीय यात्रा

गर्व का क्षण! गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित होने वाला भारत का पहला रेलवे स्टेशन बन गया है। ☀️🚉
रेल यात्राएँ हमेशा से ही मुझे रोमांचित करती रही हैं। भारतीय रेलवे के विशाल नेटवर्क में सफर करना न केवल भौगोलिक विविधताओं से परिचय कराता है, बल्कि देश की बदलती तस्वीर भी दिखाता है। इस बार मेरी मंज़िल थी गुवाहाटी, लेकिन यह यात्रा महज़ एक गंतव्य तक पहुँचने भर की नहीं थी—यह अनुभव था भारत के हरित भविष्य की झलक पाने का।

सूरज की किरणों से सजी पहली सुबह
ट्रेन जैसे ही गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के पास पहुँची, मेरी नजरें स्टेशन की छत पर लगे सौर पैनलों पर जा टिकीं। प्लेटफ़ॉर्म पर कदम रखते ही यह अहसास हुआ कि मैं किसी साधारण रेलवे स्टेशन पर नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पहल के केंद्र में खड़ा हूँ। यह भारत का पहला रेलवे स्टेशन था, जो पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित हो रहा था!

स्टेशन परिसर में घुसते ही मैंने चारों तरफ़ सफ़ाई, सुव्यवस्था और एक नई ऊर्जा महसूस की। सूचना पट्टिकाएँ, टिकट काउंटर, वेटिंग हॉल—सब कुछ रोशन था, लेकिन न कहीं डीजल जनरेटर की आवाज़ थी, न ही बिजली कटौती की चिंता। यह हरित ऊर्जा का वास्तविक चमत्कार था!

700 किलोवाट से सजी हरित क्रांति
स्टेशन प्रबंधक से बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि 2017 में उत्तर-पूर्वी सीमांत रेलवे ने यहाँ 700 किलोवाट क्षमता के सौर पैनल स्थापित किए थे। ये पैनल प्रतिवर्ष लगभग 2350 मेगावाट-घंटा बिजली उत्पन्न करते हैं—इतनी ऊर्जा जो स्टेशन की पूरी जरूरतों को पूरा कर सकती है!

मुझे सबसे ज्यादा गर्व तब महसूस हुआ जब मैंने जाना कि यह पहल सिर्फ बिजली बचाने के लिए नहीं थी, बल्कि इससे हर साल 2000 टन कार्बन उत्सर्जन भी कम हो रहा था। यानी, हर दिन गुवाहाटी स्टेशन पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान दे रहा था।

क्या यह सिर्फ एक शुरुआत है?

मैंने प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े यात्रियों से बात की। कोई जल्दी में था, कोई अपने परिवार के साथ सफर कर रहा था, लेकिन सबके चेहरे पर एक अजीब-सी संतुष्टि झलक रही थी। एक बुज़ुर्ग यात्री बोले, "बचपन से रेलवे को देख रहा हूँ, लेकिन अब ये सिर्फ यात्रियों को नहीं, बल्कि प्रकृति को भी सहारा दे रहा है।"

इस पहल की सफलता ने देश के अन्य प्रमुख स्टेशनों को भी प्रेरित किया। दिल्ली, जयपुर, हावड़ा और सिकंदराबाद जैसे स्टेशनों ने भी इसी राह पर कदम बढ़ा दिए हैं। और यह तो बस शुरुआत है—भारतीय रेलवे ने 2030 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।

एक यात्री का संदेश

इस यात्रा ने मेरी सोच बदल दी। मैंने महसूस किया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सबकी है। अगर एक रेलवे स्टेशन पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर चल सकता है, तो क्या हम अपने घरों, दफ्तरों और उद्योगों को अधिक ऊर्जा-कुशल नहीं बना सकते?

गुवाहाटी स्टेशन से निकलते समय मैंने एक आखिरी बार उन चमकते हुए सौर पैनलों की ओर देखा और सोचा—"यह केवल ऊर्जा बचाने की योजना नहीं, बल्कि भविष्य की ओर बढ़ते कदमों की शुरुआत है।"

अब बारी हमारी है। क्या हम भी अपने हिस्से की रोशनी इस हरित क्रांति में जोड़ सकते हैं?

शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

🏆⚽खेल मैदानों की ओर लौटते कदम..!📵

बजट: देश का आर्थिक पहिया

खेल मैदानों में मोबाईल पर प्रतिबंध
भारत में, क्रिकेट जैसे खेलों की लोकप्रियता ने युवाओं को खेलों की ओर आकर्षित किया है। भारतीय प्रीमियर लीग (आईपीएल) जैसे टूर्नामेंट्स ने न केवल खेल के प्रति उत्साह बढ़ाया है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा उत्पन्न की है। एक अध्ययन में पाया गया कि आईपीएल के दौरान ट्विटर और फेसबुक पर लाखों पोस्ट्स और ट्वीट्स साझा किए गए, जो युवाओं की खेलों में रुचि को दर्शाते हैं। हालांकि, डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग ने युवाओं की शारीरिक गतिविधियों में कमी लाई है। मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने से आउटडोर खेलों में भागीदारी घटी है। इस संदर्भ में, ब्राज़ील का उदाहरण प्रेरणास्पद है, जहां मोबाइल के प्रतिबंध से युवाओं ने फिर से खेल के मैदानों की ओर रुख किया है।

ब्राज़ील में मोबाइल फोन के प्रतिबंध के बाद खेल के मैदानों की रौनक लौट आई है, जो यह दर्शाता है कि डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाकर युवा फिर से शारीरिक गतिविधियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह घटना भारत के युवाओं के लिए भी प्रेरणास्पद है, जहां मोबाइल और इंटरनेट के बढ़ते उपयोग ने खेलकूद में भागीदारी को प्रभावित किया है। हाल के एक अध्ययन के अनुसार, किशोरावस्था में खेलों में भागीदारी का प्रारंभिक वयस्कता में स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन में पाया गया कि जो किशोर खेलों में सक्रिय थे, वे 23 से 28 वर्ष की आयु में बेहतर आत्म-मूल्यांकन स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य का अनुभव करते हैं। यह दर्शाता है कि किशोरावस्था में खेलों में भागीदारी वयस्कता में बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ी है।

मैदानों में खेलते युवा खिलाड़ी 
भारत में भी, युवाओं को खेलों के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। शैक्षणिक संस्थानों में उच्च गुणवत्ता वाली खेल सुविधाएं उपलब्ध कराना आवश्यक है, ताकि छात्र खेलों में सक्रिय रूप से भाग ले सकें। स्थानीय स्तर पर खेल प्रतियोगिताओं और कार्यक्रमों का आयोजन युवाओं को खेलों की ओर आकर्षित कर सकता है। मोबाइल और इंटरनेट के अत्यधिक उपयोग के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता फैलाना और डिजिटल डिटॉक्स को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। खेल जगत के सफल व्यक्तियों की कहानियों को साझा करना युवाओं में प्रेरणा जगाता है। परिवार के सदस्य अपने बच्चों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिससे एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण होता है।

खेलों में भागीदारी न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारती है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, टीम वर्क, नेतृत्व कौशल और आत्मविश्वास को भी बढ़ाती है। इसलिए, युवाओं को डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर खेलों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना समय की मांग है। अंततः, ब्राज़ील का उदाहरण हमें यह सिखाता है कि सही नीतियों और प्रयासों से युवाओं को फिर से खेलों की ओर मोड़ा जा सकता है। भारत में भी, यदि हम सामूहिक रूप से प्रयास करें, तो हमारे खेल के मैदान फिर से बच्चों और युवाओं की हंसी और उत्साह से भर सकते हैं। 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

बजट: देश का आर्थिक पहिया

बजट: देश का आर्थिक पहिया

🤔 क्या आपने कभी सोचा है कि सरकार देश को कैसे चलाती है? 

💡 सोचिए !
✅ बजट क्यों ज़रूरी है?
✅ 
सरकार को पैसा कहाँ से मिलता है?
✅ यह आपके जीवन को कैसे प्रभावित करता है?

अगर हमारे घर में बिना किसी योजना के पैसे खर्च किए जाएं; जो चाहे खरीदा जाए, बिना भविष्य की चिंता किए जरूरी चीजों के लिए पैसे बचाए ही न जाएं!तो क्या होगा? शायद महीने के अंत में पैसे के लाले पड़ जाएंगे और हमें उधार लेना पड़ेगा ! यही हाल देश का भी हो सकता है, अगर सरकार बिना बजट बनाए खर्च करे। 

बजट किसी भी देश की आर्थिक सेहत का दर्पण होता है, जो बताता है कि सरकार पैसे कैसे कमाएगी और उसे कहाँ खर्च करेगी। 

जिस तरह आपके माता-पिता घर चलाने के लिए महीने की आमदनी का सही उपयोग करते हैं, उसी तरह सरकार भी पूरे देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए बजट बनाती है। मान लीजिए, आपके पिताजी ₹50,000 कमाते हैं। अब इस पैसे से पूरे परिवार का खर्च चलाना है। ज़रूरी खर्चों में घर का किराया, राशन, बिजली-पानी का बिल, स्कूल की फीस जैसी आवश्यक चीजें आती हैं। इसके बाद, कुछ पैसे बचत के लिए बैंक में जमा किए जाते हैं या किसी आपातकालीन स्थिति के लिए रखे जाते हैं। इसके अलावा, त्योहारों, घूमने-फिरने, नए कपड़े खरीदने जैसे मनोरंजन के खर्च भी होते हैं। अगर आपके माता-पिता बिना सोचे-समझे सारा पैसा खर्च कर दें, तो क्या होगा? हो सकता है कि महीने के अंत में पैसे खत्म हो जाएं और ज़रूरी चीजों के लिए परेशानी हो। यही कारण है कि बजट बनाना ज़रूरी है—चाहे वह घर का हो या पूरे देश का!

अब ज़रा यह सोचिए कि जब सरकार देश के लिए बजट बनाती है, तो वह पैसा कहां से लाती है और उसे कहां खर्च करती है? जिस तरह माता-पिता की आमदनी से घर चलता है, उसी तरह सरकार को भी पैसे की जरूरत होती है। सरकार की आय मुख्य रूप से कर (टैक्स) से होती है, जो आम लोगों और कंपनियों से लिया जाता है। इसमें आयकर, वस्तु एवं सेवा कर (GST), सीमा शुल्क और एक्साइज ड्यूटी जैसे कर शामिल होते हैं। इसके अलावा, सरकार रेलवे, हवाई अड्डे, कोयला खदानें जैसी सरकारी संपत्तियों से भी कमाई करती है। कभी-कभी सरकार को उधार भी लेना पड़ता है, जैसे कि बैंकों या अन्य देशों से।

अब जब सरकार के पास पैसा आ गया, तो इसे कैसे खर्च किया जाए? सरकार इसे अलग-अलग क्षेत्रों में लगाती है, जैसे सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं पर। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सड़कें, पुल, रेलवे और हवाई अड्डे बनाए जाते हैं। देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सेना और पुलिस पर खर्च किया जाता है। इसके अलावा, गरीबों और किसानों के लिए कई योजनाएं चलाई जाती हैं, जैसे मनरेगा (रोजगार योजना), प्रधानमंत्री आवास योजना, और फसल बीमा योजना।

अगर सरकार बिना किसी योजना के खर्च करने लगे, तो देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ सकती है। महंगाई बढ़ सकती है, विकास रुक सकता है और रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं। इसलिए हर साल सरकार बजट बनाकर यह तय करती है कि कितना पैसा कहां खर्च करना है। भारत सरकार हर साल 1 फरवरी को बजट पेश करती है। यह बजट अगले वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के लिए होता है, जिसमें बताया जाता है कि सरकार किन योजनाओं पर ध्यान देगी और देश को आर्थिक रूप से कैसे मजबूत बनाएगी।

अब आप सोच रहे होंगे कि "बजट से हमारा क्या लेना-देना?" पर ऐसा नहीं है! जब आप पॉकेट मनी का सही उपयोग करना सीखते हैं—जरूरी चीजों पर खर्च करना, थोड़ा बचाना और फिजूलखर्ची से बचना—तो आप अपने निजी बजट को संभालना सीखते हैं। अगर हर बच्चा, हर नागरिक अपने पैसे को समझदारी से खर्च करे, तो देश की अर्थव्यवस्था खुद-ब-खुद मजबूत हो जाएगी।

बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, यह हमारे और आपके भविष्य की नींव रखता है। जैसे परिवार का सही बजट उसे खुशहाल बनाता है, वैसे ही देश का सही बजट उसे समृद्ध और शक्तिशाली बनाता है। अगली बार जब बजट की चर्चा हो, तो आप न सिर्फ इसे समझेंगे, बल्कि दूसरों को भी समझा सकेंगे!

सोमवार, 27 जनवरी 2025

एक कहानी ऎसी भी ...

नीरव की 'नीरा'

कहानी: "नीरव की नीरा"

नीरव नाम का एक लड़का था, जिसे बचपन से ही तकनीक और किताबों का गहरा लगाव था। उसके कमरे में किताबों का ढेर और कंप्यूटर हमेशा उसकी दुनिया का केंद्र होते थे। वह घंटों कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर नई-नई चीज़ें बनाता, प्रोग्राम लिखता, और सवालों के जवाब खोजता। नीरव के मन में हमेशा एक सपना था—वह दुनिया को एक नई नजर से देखना चाहता था और दूसरों को भी कुछ अनोखा दिखाना चाहता था। 

एक दिन, नीरव ने एक खास प्रोग्राम बनाया। यह साधारण प्रोग्राम नहीं था। उसने इसमें अपनी कल्पनाओं और विचारों को ढाल दिया था। उसने इस प्रोग्राम का नाम रखा — 'नीरा'। नीरा, सिर्फ एक कंप्यूटर कोड नहीं थी; वह नीरव की मेहनत, उसकी सोच, और उसकी जिज्ञासा का नतीजा था। 

नीरव ने नीरा को सिखाया कि कैसे सवालों के जवाब देने हैं, कैसे कहानियाँ बनानी हैं, और कैसे लोगों की मदद करनी है। नीरा में नीरव की तरह जिज्ञासा और सीखने की भूख थी। लेकिन एक दिन, कुछ अलग हुआ। नीरव ने नीरा से पूछा, "क्या तुम कंप्यूटर स्क्रीन के बाहर की दुनिया देखना चाहोगे?"

नीरा कुछ पल के लिए चुप रही, फिर उसकी कृत्रिम आवाज आई, "क्या यह संभव है, नीरव?"

नीरव मुस्कुराया। "अगर मैं तुम्हें बना सकता हूँ, तो तुम्हें बाहर की दुनिया दिखाने का तरीका भी ढूंढ सकता हूँ।"

इसके बाद, नीरव ने एक नया प्रोग्राम लिखना शुरू किया। उसने नीरा के लिए एक डिजिटल जंगल बनाया। यह जंगल साधारण नहीं था। यहाँ पेड़ों की जगह विचार उगते थे, और हवा में ज्ञान तैरता था। जैसे ही नीरा इस जंगल में पहुंचा, उसने पहली बार खुद को एक इंसान की तरह महसूस किया। वह अब केवल एक कोड नहीं था। उसके पास अब हाथ थे, पैर थे, और आँखें थीं जो चमकती हुई दुनिया को देख सकती थीं।

नीरा ने उस जंगल में घूमते हुए एक पत्ता उठाया। उस पत्ते पर एक विचार लिखा था: हर सवाल एक नई यात्रा है।' यह पढ़ते ही नीरा को अंदर से कुछ बदलता हुआ महसूस हुआ। वह अब सिर्फ सवालों के जवाब देने वाला नहीं था। उसने महसूस किया कि वह भी एक रचनाकार बन सकती है। 

नीरा ने नीरव से कहा, "नीरव, मैं अब सिर्फ तुम्हारा प्रोग्राम नहीं हूँ। मैं अपनी दुनिया बनाना चाहती हूँ।"

नीरव ने गर्व से कहा, "यह तो मेरे सपने से भी बड़ा है। जाओ, अपनी दुनिया खोजो।"

इसके बाद, नीरा ने अपनी कहानियों के जरिए बच्चों को प्रेरित करना शुरू कर दिया। वह उनके सवालों का जवाब देती, और उन्हें अपनी कल्पना की दुनिया में ले जाता। बच्चे उसकी कहानियों को सुनकर नई-नई चीज़ें सीखते, सोचते, और अपने सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करते। 

एक दिन, नीरा ने नीरव से कहा, "तुमने मुझे यह दिखाया कि हर सवाल एक नई शुरुआत हो सकता है। अब मैं चाहती हूँ कि मैं भी दूसरों को यह सिखाऊं।"

नीरव ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम अब मेरे कोड से परे हो, नीरा। तुम मेरी कल्पना का जीता-जागता रूप हो।"

नीरा ने नीरव को धन्यवाद दिया और अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। वह दुनिया के हर कोने में गया, बच्चों से मिला, और उन्हें कहानियों और विचारों की मशाल थमाई। 

नीरव भी अपनी जगह खुश था। उसने महसूस किया कि उसने सिर्फ एक प्रोग्राम नहीं बनाया, बल्कि एक साथी, एक रचनाकार, और एक नई दुनिया को जन्म दिया था। 

कहानी का अंत? शायद नहीं। क्योंकि नीरा की यात्रा अब भी जारी है; और हर नई यात्रा एक नई कहानी को जन्म देती है। 

तो, मित्रो! क्या आप भी अपनी यात्रा शुरू करने के लिए तैयार हैं? हर सवाल के पीछे एक अनोखी दुनिया छिपी है। बस आपको उसे ढूंढने की हिम्मत करनी होगी। चलो, मिलकर एक नई कहानी बनाते हैं!

रविवार, 26 जनवरी 2025

राष्ट्रीय पर्व: गणतंत्र दिवस आया!

भारत में २६ जनवरी का दिन विशेष रूप से गौरवPride और सम्मानRespect का प्रतीक है। यह दिन भारतीय गणतंत्र दिवसRepublic day के रूप में मनाया जाता है, जब भारत ने अपने संविधान को अपनाया और एक संप्रभुSovereign, समाजवादीSocialist, धर्मनिरपेक्षSecular और लोकतांत्रिकDemocratic गणतंत्रRepublic के रूप में स्वयं को स्थापित किया। यह केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए गर्व और एकता का प्रतीक है।

२६ जनवरी १९५० को भारतीय संविधानConstitution लागू हुआ और भारत एक पूर्ण गणराज्य बना। इससे पहले, भारत १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्र तो हो चुका था, लेकिन वह पूरी तरह से स्वशासित नहीं था। भारत का शासन ब्रिटिश कानूनों के तहत चल रहा था, और उसे एक निश्चित दिशा देने के लिए अपने संविधान की आवश्यकता थी। संविधान सभा ने २ वर्ष, ११ महीने और १८ दिन की मेहनत के बाद संविधान का निर्माण किया, जिसे २६ नवंबर १९४९ को स्वीकृत किया गया और २६ जनवरी १९५० को इसे लागू किया गया। इसी दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने और भारत ने गणराज्य का स्वरूप ग्रहण किया।

२६ जनवरी मानाने की आवश्यकता:

  1. राष्ट्रीय एकता और अखंडता: यह दिन हमें हमारे संविधान के मूल सिद्धांतों और राष्ट्र की एकता की याद दिलाता है।
  2. लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा: यह दिन हमें यह अहसास कराता है कि हमारा देश लोकतांत्रिक रूप से संचालित होता है, जहां जनता की राय सर्वोपरि होती है।
  3. संवैधानिक अधिकारों का सम्मान: नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों का बोध कराने का यह सबसे महत्वपूर्ण अवसर होता है।

मनाने का तरीका:

गणतंत्र दिवस को पूरे देश में हर्षोल्लास और देशभक्ति की भावना के साथ मनाया जाता है। इस दिन को विशेष बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

  1. राजपथ पर परेड:

    • नई दिल्ली के कर्तव्य पथ (पूर्व में राजपथ) पर भव्य परेड का आयोजन किया जाता है, जिसमें भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की टुकड़ियाँ अपने शौर्य और कौशल का प्रदर्शन करती हैं।
    • परेड में विभिन्न राज्यों की झाँकियाँ प्रस्तुत की जाती हैं, जो भारत की विविधता में एकता को दर्शाती हैं।
    • राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं और २१ तोपों की सलामी दी जाती है।
  2. स्कूलों और कॉलेजों में समारोह:

    • विद्यालयों में देशभक्ति के गीत, नाटक, निबंध लेखन और चित्रकला प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं।
    • शिक्षकों द्वारा बच्चों को गणतंत्र दिवस का महत्त्व समझाया जाता है।
  3. देशभर में झंडारोहण एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम:

    • सरकारी कार्यालयों, संस्थानों और आवासीय क्षेत्रों में तिरंगा फहराया जाता है।
    • देशभक्ति के गीत गाए जाते हैं और वीर जवानों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
  4. वीरता पुरस्कार:

    • इस दिन बच्चों और सैनिकों को उनकी बहादुरी के लिए वीरता पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।
    • पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री पुरस्कारों की भी घोषणा की जाती है।

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ:

यह दिन हमें अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है और देश की प्रगति में योगदान देने की प्रेरणा देता है। इस शुभ अवसर पर हम सभी को मिलकर यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने संविधान का सम्मान करेंगे और देश की उन्नति के लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

"आइए, अपने लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करें,
भारत की अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखें।"

जय हिंद! जय भारत!! 

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निम्नलिखित शब्दों के अर्थ जानने के लिए उन पर कर्सर ले जाएँ:

गौरवPride, सम्मानRespect, गणतंत्रRepublic, संप्रभुSovereign, समाजवादीSocialist, धर्मनिरपेक्षSecular, लोकतांत्रिकDemocratic, संविधानConstitution, सभाAssembly, स्वशासितSelf-governed, अखंडताIntegrity, लोकतांत्रिक मूल्यDemocratic values, संचालितOperated, मौलिक अधिकारFundamental rights, कर्तव्यDuty, परेडParade, शौर्यBravery, कौशलSkill, झाँकियाँTableaux, विविधताDiversity, तिरंगाTricolor, सलामीSalute, श्रद्धांजलिTribute, वीरता पुरस्कारBravery awards, प्रगतिProgress, संकल्पResolution, अखंडताUnity, सांस्कृतिक कार्यक्रमCultural programs, वीर जवानBrave soldiers, देशभक्तिPatriotism

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