📖 वाचन · अभ्यास 1
पाठ को ध्यान से पढ़िए, पाठ-साक्ष्य पहचानिए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
कुल अंक: 10✍️ लेखन · अभ्यास 5
दिए गए लेख से प्रेरणा लेकर अपने विचारों और अनुभवों को स्वतंत्र रूप से लिखिए।
कुल अंक: 15संस्मरण: मैं और हसन
वाचन में हो रही किसी भी असुविधा में ‘वाचन सहायता साथी™’ आपके लिए मददगार हो सकता है।
कुछ रिश्ते उम्र के साथ पुराने नहीं होते। वे हमारे साथ-साथ चलते रहते हैं और किसी साधारण-सी बात, किसी आवाज़ या किसी त्योहार की खुशबू से अचानक फिर सामने आ खड़े होते हैं। हसन मेरे बचपन का ऐसा ही दोस्त था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हमारी दोस्ती केवल साथ खेलने या स्कूल जाने तक सीमित नहीं थी; वह हमारे घरों और पूरे मोहल्ले के जीवन का हिस्सा थी।
हमारा स्कूल जाने का रास्ता गोमती नदी के किनारे से होकर जाता था। सुबह की जल्दी में भी हम कुछ देर नदी को देखते, रास्ते की छोटी-बड़ी बातों पर बहस करते और कभी-कभी बिना किसी खास वजह के हँसते हुए आगे बढ़ जाते। बचपन में दुनिया बहुत बड़ी नहीं लगती थी—एक स्कूल, कुछ गलियाँ, नदी का किनारा और दोस्तों की टोली ही जैसे पूरी दुनिया थी।
ईद का समय आते ही हमारी दुनिया और भी रंगीन हो जाती। ईदगाह के मेले का इंतज़ार हम दोनों बहुत पहले से करने लगते थे। वहाँ पहुँचकर हमारी जेबों में जितने पैसे होते, वे बहुत देर तक टिकते ही नहीं थे। कभी कोई मिठाई पसंद आ जाती, कभी कोई दूसरी चीज़; और थोड़ी देर बाद हम एक-दूसरे को देखकर हँसते कि अभी तो जेब में पैसे थे! मेले से लौटते समय जेबें हल्की होतीं, लेकिन मन खूब भरा हुआ होता।
घर पर बैठ मिठाइयाँ और कचौरियाँ उड़ाई हों तथा ईदगाह के मेले में मिठाइयाँ खाई हों।
हमारे घरों में त्योहार किसी एक परिवार की सीमा में नहीं रहते थे। ईद हो या कोई दूसरा त्योहार, एक घर से दूसरे घर तक मिठाइयाँ और कचौरियाँ पहुँचती थीं। कभी हम दूसरे घर में बैठकर खाते, कभी हमारे यहाँ कोई आ जाता। त्योहार की खुशी का अर्थ केवल अपने लिए अच्छा खाना या नए कपड़े पहनना नहीं था; खुशी तब पूरी लगती थी जब उसे पड़ोसियों और दोस्तों के साथ बाँटा जाए।
शायद हमने खुशियाँ बाँटना किसी किताब से नहीं सीखा था। हमने अपने परिवारों और मोहल्ले के बड़ों को देखकर सीखा था। वे किसी त्योहार को केवल धार्मिक अवसर की तरह नहीं, बल्कि मिलने-जुलने, एक-दूसरे का हाल पूछने और साथ बैठने के अवसर की तरह लेते थे। बच्चों के लिए यह सब इतना स्वाभाविक था कि हमें कभी लगा ही नहीं कि हम कोई बड़ी सीख सीख रहे हैं।
समय बीतता गया। पढ़ाई, काम और शहरों की दूरियाँ हमारे बीच आ गईं। फिर भी हसन से जुड़ी कुछ स्मृतियाँ मन में वैसी ही बनी रहीं। वर्षों बाद जब एक दिन उससे बात हुई तो उसने मुझे उसी पुराने, मज़ाकिया अंदाज़ वाले संबोधन से पुकारा, जिसे वह बचपन में इस्तेमाल करता था। बस, इतना सुनना था कि मेरे सामने जैसे वही नदी का किनारा, वही स्कूल का रास्ता और वही ईदगाह का मेला लौट आया। मुझे अपनी ही हँसी पर काबू नहीं रहा। हसन शायद समझ भी नहीं पा रहा था कि एक छोटे-से संबोधन ने मेरे भीतर कितनी पुरानी यादों का दरवाज़ा खोल दिया था।
उस बातचीत के बाद मैंने देर तक अपने बचपन के बारे में सोचा। हमारी दोस्ती में कोई बड़ी घोषणा नहीं थी, कोई औपचारिक वादा नहीं था। वह छोटी-छोटी चीज़ों से बनी थी—साथ चलने से, मेले में पैसे खर्च कर देने से, एक-दूसरे के घर बैठकर खाने से, त्योहारों की खुशियाँ बाँटने से और उन लोगों को देखकर सीखने से जिन्होंने हमारे आसपास अपनापन बनाए रखा था।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि बचपन हमें केवल खेलना नहीं सिखाता; वह हमें रिश्तों की भाषा भी सिखाता है। हसन के साथ बिताए वे दिन इसलिए याद नहीं हैं कि उनमें कोई असाधारण घटना हुई थी। वे इसलिए याद हैं क्योंकि उनमें जीवन बहुत सहज था—खुशी साझा थी, घरों के दरवाज़े खुले थे और दोस्ती के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं पड़ती थी।
वाचन: अभ्यास 1
लेखक और हसन स्कूल जाते समय कहाँ से होकर चलते थे?
ईदगाह के मेले में लेखक और हसन की जेबें कई बार खाली क्यों हो जाती थीं?
लेखक और हसन की मित्रता की कौन-सी विशेषता उनके बचपन की स्मृतियों से स्पष्ट होती है?
बचपन में लेखक और हसन ने खुशियाँ बाँटना किससे सीखा था?
मेले से लौटते समय उनकी जेबें हल्की थीं, फिर भी उनका मन भरा हुआ क्यों था?
लेखक और हसन के परिवारों में त्योहारों में अपनापन कैसे दिखाई देता था? (दो बिंदु)
लेखक की हँसी क्यों नहीं रुक रही थी?
बहुत अच्छा! आपने पूरी परत खोल ली।
आपने सभी प्रश्नों को प्रयास करके पूरा किया। अब लेखन की ओर बढ़ने का समय है।
लेखन: अभ्यास 5 →लेखन: अभ्यास 5
आपकी मुलाकात कई वर्षों बाद अपने किसी पुराने मित्र से हुई। अपने मित्र को एक अनौपचारिक ईमेल लिखकर इस मुलाकात के बारे में बताइए।
- बताइए कि अचानक हुई मुलाकात पर आपको कैसा लगा।
- इस मुलाकात के दौरान हुई किसी एक यादगार घटना या बातचीत का वर्णन कीजिए।
- समझाइए कि इस मुलाकात ने आपको पुराने रिश्तों के बारे में क्या सोचने पर मजबूर किया।
प्रिय रोहन,
तुम्हें यह जानकर शायद विश्वास नहीं होगा कि कल स्टेशन पर मेरी अचानक मुलाकात हमारे पुराने मित्र अमन से हो गई। पहले तो हम दोनों एक-दूसरे को पहचान ही नहीं पाए, लेकिन जब उसने बचपन का मेरा वही पुराना उपनाम लेकर मुझे बुलाया, तो जैसे कई साल पीछे लौट गया। हम पास की चाय की दुकान पर बैठ गए और स्कूल के दिनों की बातें करने लगे। बातचीत के बीच उसने याद दिलाया कि कैसे हम छुट्टी के बाद नदी के किनारे बैठकर घंटों बातें किया करते थे। यह सुनकर मुझे एहसास हुआ कि समय और दूरी बहुत कुछ बदल सकते हैं, लेकिन सच्ची दोस्ती की आत्मीयता हमेशा पूरी तरह समाप्त नहीं होती। उस छोटी-सी मुलाकात ने मुझे अपने पुराने मित्रों से फिर संपर्क करने का मन बना दिया।
जल्दी मिलना।
तुम्हारा मित्र,
आरव
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