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गुरुवार, 2 जनवरी 2025

महाकुंभ: गंगा तट पर संस्कृति संगम

१४४ वर्ष बाद आया महाकुंभ -२०२५
        'महाकुंभ' भारत में होने वाला एक ऐसा आयोजन है जो मानव सभ्यता के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पक्षों का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का सार है, जो सदियों से अपनी परंपराओं और ज्ञान को जीवित रखते हुए आधुनिक युग में भी अपनी महत्ता बनाए हुए है।
        
        महाकुंभ मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है। यह हर बारहवें वर्ष प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, और नासिक में बारी-बारी से आयोजित होता है। इसका मूल वेदों और पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख है। यह मेला समुद्र मंथन की उस घटना से प्रेरित है, जब अमृत कलश के लिए देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष हुआ था। यह कहा जाता है कि अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरीं, जो आज के महाकुंभ स्थलों के रूप में पूजित हैं।

        महाकुंभ केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, यह एक सांस्कृतिक संगम भी है, जहाँ विभिन्न समुदाय, विचारधाराएं, और कला रूप एकत्रित होते हैं। गंगा, जो भारतीय संस्कृति की जीवनधारा मानी जाती है, महाकुंभ का केंद्र है। इसके तट पर आयोजित अनुष्ठान, संगम स्नान, और धार्मिक प्रवचन भारतीय समाज के आध्यात्मिक मूल्यों को सशक्त करते हैं। महाकुंभ में स्नान का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति माना गया है। गंगा तट पर संत-महात्माओं और भक्तों का जमावड़ा केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रसार नहीं करता, बल्कि यह मानव चेतना को उच्चतर स्तर तक पहुँचाने का माध्यम भी है। ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए प्रवचन, ध्यान और योग शिविर, तथा वैदिक मंत्रोच्चारण से समूचा वातावरण दिव्यता से भर जाता है।

        महाकुंभ भारतीय समाज की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। यहाँ देश के कोने-कोने से आए लोग अपनी परंपराओं, वेशभूषा, और लोक कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। कठपुतली नृत्य, लोकगीत, और पारंपरिक नृत्य जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम इस आयोजन को और भी आकर्षक बनाते हैं। मेले में लगने वाली प्रदर्शनियां भारतीय हस्तशिल्प, संगीत, और साहित्य को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करती हैं। महाकुंभ केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि शैक्षिक महत्व का भी आयोजन है। यहाँ धार्मिक और सांस्कृतिक संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं, जिनमें विद्वान भारतीय परंपराओं, धर्म और दर्शन पर अपने विचार साझा करते हैं। यह आयोजन न केवल प्राचीन ग्रंथों के महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि समकालीन सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित करता है।

        महाकुंभ के दौरान गंगा की स्वच्छता और संरक्षण को भी प्राथमिकता दी जाती है। यह आयोजन पर्यावरणीय जागरूकता फैलाने का माध्यम बन गया है। संगम पर इकट्ठा होने वाले लाखों लोग 'स्वच्छ भारत' और 'गंगा स्वच्छता अभियान' जैसे अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। महाकुंभ का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। यह आयोजन विदेशी पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। वे इस महोत्सव को भारतीय संस्कृति और जीवन शैली को समझने का एक सुनहरा अवसर मानते हैं। इसके महत्व के कारण ही यूनेस्को ने वर्ष 2017 में  इसे "मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर" के रूप में मान्यता दी है। 

        आज के डिजिटल युग में महाकुंभ ने अपनी प्रस्तुति को और व्यापक बनाया है। जिवंत प्रसारण, आभाषीय यात्रा, और सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से यह आयोजन विश्व के हर कोने तक पहुँचता है। गूगल मैप, युट्यूब आदि आधुनिक तकनीको के उपयोग ने इसे अधिक सुलभ और आकर्षक बना दिया है। महाकुंभ न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व का आयोजन है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा, और विविधता का जीवंत प्रतीक है। यह गंगा तट पर एक ऐसा संगम प्रस्तुत करता है, जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक संसार एक-दूसरे से जुड़ते हैं। प्राचीन ज्ञान, सांस्कृतिक विविधता, और सामाजिक समरसता का यह महोत्सव भारतीय सभ्यता की महानता को उजागर करता है। महाकुंभ केवल एक मेला नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक प्रेरणा स्रोत है, जो जीवन की शाश्वतता और पवित्रता को रेखांकित करता है।

        इस प्रकार महाकुंभ भारतीय संस्कृति की उस धरोहर को जीवित रखता है, जो 'वसुधैव कुटुंबकम्' के सिद्धांत पर आधारित है और समस्त मानव जाति के कल्याण का संदेश देती है।

नई शब्दावली

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मंगलवार, 10 दिसंबर 2024

लाल चंदन: भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर

रक्त चंदन, जिसे "लाल चंदन" भी कहा जाता है, अपनी दुर्लभता, अनोखे गुणों और आर्थिक महत्व के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह पेड़ केवल भारत के आंध्र प्रदेश राज्य की शेषाचलम पहाड़ियों में पाया जाता है और इसकी लकड़ी का चटक लाल रंग इसे और अधिक विशिष्ट बनाता है। हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म 'पुष्पा' ने इसे लोकप्रियता के नए आयाम दिए हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक दिलचस्प और जटिल है।
लाल चन्दन की लकड़ी

लाल चंदन की लकड़ी में औषधीय गुण होते हैं, जो पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में उपयोगी साबित हुए हैं। इसके अलावा, यह लक्जरी फर्नीचर, संगीत वाद्ययंत्र, और धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोगी है। चीन के आखिरी शाही किंग वंश के दौरान, रक्त चंदन के महत्व को विशेष रूप से मान्यता दी गई थी। आज भी पूर्वी एशियाई देशों में इसकी अत्यधिक मांग है, जहां इसे सौंदर्य और उपयोगिता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

लाल चंदन का पेड़ बेहद धीरे-धीरे बढ़ता है और इसे पूरी तरह परिपक्व होने में 50 से 60 वर्ष लगते हैं। इस धीमे विकास के कारण यह न केवल दुर्लभ है, बल्कि अत्यंत महंगा भी है। वर्तमान में, एक किलो लाल चंदन की कीमत ₹90,000 से ₹1,50,000 तक हो सकती है। इस कारण यह लकड़ी तस्करों के बीच अत्यधिक मांग में रहती है। लाल चंदन की अवैध तस्करी एक गंभीर मुद्दा है। इसका निर्यात भारतीय कानूनों के तहत प्रतिबंधित है और इसे 'कंसर्वेशन ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज' (CITES) में शामिल किया गया है। फिर भी, तस्कर इसे फल, सब्जी, दूध, ग्रेनाइट स्लैब्स, सौंदर्य प्रसाधनों, या अन्य तरीकों से छिपाकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहुंचाने का प्रयास करते हैं। हालांकि, डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) और अन्य सरकारी एजेंसियां इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही हैं।

रक्त चंदन न केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का भी हिस्सा है। इसकी अत्यधिक मांग और अवैध कटाई के कारण यह पेड़ संकट में है। इसीलिए इसे संरक्षित करने के लिए सख्त कानून और जनजागरूकता की जरूरत है। भारत में चंदन सिर्फ एक लकड़ी नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। इसकी सुरक्षा और संरक्षण न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को भी बचाने में सहायक है। लाल चंदन प्रकृति का अनमोल उपहार है, जिसे बचाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। चाहे इसके औषधीय गुण हों, सांस्कृतिक महत्व हो, या इसकी आर्थिक उपयोगिता, यह पेड़ हमारे पर्यावरण और समाज के लिए बेहद मूल्यवान है। अवैध तस्करी और अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए जाने चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस दुर्लभ धरोहर का आनंद ले सकें।

 "लाल चंदन" पर बनाए जा रहे एक प्रकल्प के बारे में  शिक्षिका डॉ. मनसा मिश्रा द्वारा अपने छात्र रवि के साथ  चर्चा का संवाद सुनिए -
Copyrights Reserve @ IndiCoach International, Mumbai. 2024

पत्तल और कुल्हड़: पर्यावरण, स्वास्थ्य और संस्कृति के रक्षक

Styled Green Box
भारत में शादियों और उत्सवों का मौसम शुरू होते ही प्लास्टिक डिस्पोजेबल बर्तनों का बड़े पैमाने पर उपयोग देखा जाता है। यह आधुनिक जीवनशैली का एक हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके कारण हमारे पर्यावरण, स्वास्थ्य और संस्कृति पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, परंपरागत देशी पत्तल और मिट्टी के कुल्हड़ों का उपयोग पुनः आरंभ करना न केवल एक सरल समाधान है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और संस्कृति के पुनरुत्थान का भी प्रतीक है।

पत्तल पर भोजन
कमल, केला और पलास के पत्तल पर भोजन
पत्तल: हमारी परंपरा का उपहार
भारत में पत्तलों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। प्राचीन समय में भोजनों को पत्तलों पर परोसने की परंपरा न केवल पर्यावरण के अनुकूल थी, बल्कि इसका स्वास्थ्यवर्धक महत्व भी था। पत्तलों को बनाने में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों की पत्तियों का उपयोग किया जाता था। इनका उपयोग पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद लाभकारी है।
उदाहरण के लिए:
  • वटवृक्ष और पलाश की पत्तियाँ: पलाश की पत्तियों पर भोजन करना स्वर्ण के बर्तनों में भोजन करने जैसा पुण्य और स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।
  • केले की पत्तियाँ: केले के पत्तलों पर भोजन करने से चांदी के बर्तनों के उपयोग का अनुभव मिलता है।
कुल्हड़ वाली चाय
कुल्हड़ वाली चाय
पर्यावरण संरक्षण में योगदान:
  • कचरे का प्रबंधन: प्लास्टिक के बर्तनों की सफाई में उपयोग होने वाले रसायन और पानी नदियों और अन्य जल स्रोतों को प्रदूषित करते हैं। इसके विपरीत, पत्तल और कुल्हड़ मिट्टी में आसानी से नष्ट होकर खाद का निर्माण करते हैं।
  • पानी की बचत: इनका उपयोग करने के बाद धोने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे पानी की बड़ी मात्रा बचाई जा सकती है।
  • वृक्षारोपण का प्रोत्साहन: पत्तल बनाने के लिए अधिक से अधिक वृक्षों की पत्तियों की आवश्यकता होगी, जिससे वृक्षारोपण को बढ़ावा मिलेगा और ऑक्सीजन उत्पादन में वृद्धि होगी।
प्रकृति, पर्यावरण, संस्कृति और परंपरा का संरक्षण: पत्तल और कुल्हड़ का उपयोग हमारी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है। यह केवल भोजन परोसने का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
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अन्य सहायक सामग्री - 

सोमवार, 26 फ़रवरी 2024

कंबाला महोत्सव : कृषक सांस्कृतिक उत्सव का संगम

कंबाला भैंसों की एक साहसिक दौड़ प्रतियोगिता है जो तटीय कर्नाटक जिलों में लोकप्रिय है। 'कंबाला' को हिंदी में 'भैंसों की दौड़ या भैंसेगाड़ी की दौड़' कह सकते हैं। इसमें कीचड़ भरे मैदान में भैंस दौड़ती हैं। कंबाला ग्रामीणों के लिए एक शानदार खेल और मनोरंजन कार्यक्रम है और पर्यटकों और फोटोग्राफरों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। यह दौड़ कीचड़ से भरे दो समानांतर ट्रैक पर होने वाली रोमांचक दौड़ होती है। इस कार्यक्रम के दौरान राज्य की राजधानी में 'संपूर्ण तटीय कर्नाटक संस्कृति’ की झलक देखने को मिलती है। यह दौड़ कर्नाटक की 700 वर्षों से अधिक पुरानी सांस्कृतिक धरोहर है। कंबाला कार्यक्रम धान की कटाई के बाद शुरू होते हैं, जो आमतौर पर अक्टूबर के महीने में होता है। नवंबर से मार्च के बीच तुलुनाडु (कर्नाटक के दक्षिणी जिलों में जो तुलु भाषी क्षेत्र हैं) के विभिन्न हिस्सों में कंबाला कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। तटीय कर्नाटक के 45 से अधिक विभिन्न गाँव हर साल कंबाला दौड़ मनाते हैं। कुछ लोकप्रिय स्थलों में फ़्रेम मैंगलोर, मूडुबिदिरे, पुत्तूर, कक्केपाडावु, कुलुरु, सुरथकल, उप्पिनंगडी, दोस्त आदि प्रमुख हैं। इस आयोजन में प्रतिवर्ष 2 से 3 लाख आगंतुक आते हैं।

कंबाला महोत्सव में भैंसों की दौड़ (छवि स्रोत-भारतीय पर्यटन मंत्रालय) 

इस क्षेत्र में भैंसों के मालिक और किसान अपनी भैंसों का बहुत ख्याल रखते हैं और उनमें से सबसे अच्छी भैंसों को कंबाला में दौड़ के लिए अच्छी तरह से खिला-पिलाकर सेवा करते हैं; उन्हें सजाने के लिए उनके शरीर और सींगों पर तेल लगाते हैं। उनके पालन-पोषण का विशेष ख्याल रखते हैं। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं कि कंबाला भैंसों को नुकसान न पहुँचाया जाए, उन्हें किसी प्रकार से प्रताड़ित न किया जाए या उनके साथ बुरा व्यवहार न किया जाए। 

साभार - नवभारत टाइम्स
कंबाला दौड़ में भैंसों को नियंत्रित करने वाले व्यक्ति को धावक (जॉकी) कहते हैं। धावक वह व्यक्ति होता है जो भैंसों के साथ दौड़ता है। इन भैंसों को दौड़ के समय नियंत्रित करना कोई आसान कार्य नहीं है, इसे केवल एथलेटिक युवा ही भैंस जैसे विशाल जानवर को संभालने का जज़्बा रखते हैं। धावकों भैंसों को दौड़ाते समय लकड़ी के तख्ते पर खड़े होते हैं जिसे 'हलेज' के नाम से जाना जाता है, यह दोनों भैंसों को एक साथ बाँधें रखने वाले सेटअप से जुड़ा होता है जिसे 'नेगिलू' कहा जाता है। नेगिलू के लिए हलेज आधार होता है। दोनों एक दूसरे से जुड़े होते हैं।  कंबाला धावक भैंसों को चाबुक या रस्सियों से नियंत्रित करता है। दौड़ के दौरान धावक जितना संभव हो सके भैंसों को दौड़ाकर कीचड़ युक्त पानी उड़ाता चलता है, जिससे दर्शकों को दौड़ देखने में मनोरंजन और आनंद की अनुभूति होती है। 

कंबाला स्थल सैकड़ों भैंसों और उनकी देखभाल करने वाली टीमों का घर होता है, ठीक उसी तरह जैसे गाड़ियों की दौड़ में रेसिंग कार और उनके चालक दल होते हैं। भैंसों की दो टीमें अपने धावक के साथ दो समानांतर रेस गलियारों में फिनिश लाइन की ओर दौड़ती हैं। यह दौड़ पूरे दिन चलती है और विजेता अगले राउंड के लिए सागल होते रहते हैं। सबसे पहले फिनिश लाइन पर पहुंचने के अलावा, ऊपर दिए गए लक्ष्य तक पानी उड़ाने के लिए भी पुरस्कार दिए जाते हैं जिसे 'कोलू' के नाम से जाना जाता है। कंबाला भैंस दौड़ प्रतियोगिता के दौरान भैंसों को आमतौर पर जोड़े में ही दौड़ाया जाता है, जिन्हें हल और रस्सियों से एक साथ बाँधा जाता है। कंबाला दौड़ की लंबाई लगभग 150 मीटर की होती है। जिसे अच्छी भैंसें 12 सेकंड से भी कम समय में यह दौड़ पूरी कर पाती हैं। 

यदि आप भी कंबाला का कार्यक्रम देखने के शौकीन हैं तो स्थानीय मीडिया और कुछ निजी वेबसाइटों पर से इसकी जानकारी पढ़ सकते हैं। अगर आपको सर्दियों और गर्मियों के महीनों में कर्नाटक के तटीय शहरों जैसे मंगलुरु, उडुपी, मूडाबिदिरे में जाने का अवसर मिले, तो आप अपने स्थानीय मेज़बान अथवा होटल के कर्मचारी से निकटतम या अगले कंबाला कार्यक्रम के बारे में अवश्य पूछें इससे आपको अपने नजदीकी कंबाला दौड़ तक पहुँचने में मदद मिलेगी, जहाँ आप दौड़ का आनंद ले सकेंगे। अधिकतर कंबाला कार्यक्रम मुफ़्त होते हैं और कई घंटों अथवा रात भर चलते हैं। 

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2024

चित्र वर्णन

चित्र का अवलोकन करके उसमें वर्णित बातों को अपने शब्दों में लिखने को 'चित्र-वर्णन' कहते हैं। 

अभ्यास 1) नीचे दिए गए चित्र को ध्यानपूर्वक देखकर उसे अपने शब्दों में वर्णित कीजिए। आपके वर्णन में निम्नलिखित बिन्दुओं को अवश्य शामिल करें - 

  • चित्र का मुख्य विषय
  • लोग क्या कर रहें हैं?
  • आपके कोई सुझाव 
आपका लेखन 120 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिए। विषय वस्तु के लिए 3 अंक और उचित भाषा और वाक्य रचना के लिए 5 अंक देय होंगे। 

शब्दावली - 
उत्तर -  दिए गए चित्र में मोबाइल के दुष्प्रभावों को दर्शाया गया है। इसमें एक भारतीय संयुक्त परिवार है, जो किसी धार्मिक अथवा सांस्कृतिक आयोजन पर सहभोज (दावत) के लिए इकट्ठा हुआ है। यहाँ सभी उम्र के नारी-नर उपस्थित हैं। वे सभी कुर्सियों पर बैठे हैं। सभी ने भारतीय पारंपरिक पहनावे पहने रखे हैं। बूढ़े पुरुष ने कुर्ता-धोती और सदरी पह रखी है, महिलाएं भारतीय साड़ी पहनी हैं। युवक-युवतियाँ आधुनिक भारतीय पोशाकें पहने हैं। जबकि बच्चे भी पारंपरिक पोशाकों में हैं। मेज पर सभी के लिए पारंपरिक पकवान रखें हैं।
   आश्चर्य की बात तो यह है कि चित्र का दृश्य जहाँ भारतीय संस्कृति का बोध करता हैं वहीं सभी के हाथ में भ्रमणध्वनि (मोबाइल) डिजिटल युग का बोध करता है। सभी अपने-अपने भ्रमणध्वनियों पर सामाजिक मीडिया में ऐसे खोये हैं कि उन्हें आस-पास की दुनिया की चिंता की नहीं है। उनके सामने रखे ताजे और स्वादिष्ट भोजन का उन्हें भान तक नहीं है।
   इन सभी को मोबाइल और सामाजिक मीडिया की ऐसी लत लगी है कि संयुक्त परिवार में रहने के बावजूद इनमें आपसी प्रेम का रंच मात्र भी संस्कार नहीं रह गया है। बच्चे खेल-कूद और पढ़ाई की उम्र में जिस तरह से मोबाइलों में व्यस्त हैं शीघ्र ही यदि ये मानसिक रूप से बीमार हो जाय तो कोई आश्चर्य न होगा। इनके अभिभावक न केवल इनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर अरहे हियन बल्कि इनके भविष्य को भी चौपट कर रहे हैं। जिन्हें अपने बच्चों को समझाना चाहिए वे स्वयं मोबाइल में खोएँ हैं। निश्चित ही ये भी जल्द तनाव, अवसाद और कई मानसिक रोगों के शिकार हो सकते हैं। 
   भला! ये अपनी भावी पीढ़ी को क्या शिक्षा और संस्कार देंगे?   


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