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बुधवार, 18 दिसंबर 2024

प्रवासी भारतीयों की अमेरिका में बढ़ती साझेदारी

अमेरिका में भारतीय
भारत देश जिसे पश्चिमी लोग सपेरों, गँवारों और झाड़-फूँक में आस्था रखने वालों का देश कहते थे। आज यहीं के युवा पश्चिमी देशों में अपनी बुद्धि का लोहा मनवाने को तैयार है।संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में भारतीय मूल के लोगों का प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है। शिक्षा, व्यापार, चिकित्सा, तकनीकी और राजनीति में उनकी उपलब्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय समुदाय ने अमेरिका में न केवल अपनी साख़ बनाई है, बल्कि वहाँ सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है। 

यह जानकर आश्चर्य होगा कि अमेरिका में लगभग 40% होटलों के मालिक भारतीय मूल के हैं, जिनमें से 70% का सरनेम "पटेल" है। गुजराती समुदाय 1970 के दशक में अमेरिका प्रवास किए और होटल उद्योग में कदम रखा। इन लोगों ने छोटे मोटल से शुरुआत की और आज बड़े-बड़े होटल चेन के मालिक बन गए हैं। कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. दीपक चोपड़ा, जो आप्रवासी समुदायों पर शोध करते हैं, कहते हैं, "गुजराती समुदाय ने अपनी एकता और व्यावसायिक सूझबूझ से जो सफलता हासिल की है, वह अन्य प्रवासी समुदायों के लिए एक प्रेरणा है। ‘पटेल मोटल कार्टेल’ का अस्तित्व केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि यह उनके सामूहिक प्रयासों और अनुशासन का प्रतीक है।"

चिराग पटेल, जो अमेरिका में 100 से अधिक होटलों के मालिक हैं, कहते हैं, "हमने अपनी जड़ों से जुड़कर, परिवार के मूल्यों और मेहनत के बल पर होटल उद्योग में सफलता पाई है। हमारा उद्देश्य न केवल व्यवसाय करना है, बल्कि समुदाय को सशक्त बनाना भी है।" अमेरिका में पंजाबी समुदाय का भी एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट योगदान है। होटल उद्योग में भले ही गुजराती समुदाय का वर्चस्व है, लेकिन पंजाबी समुदाय ने कृषि, परिवहन, व्यवसाय, और राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई है। कैलिफोर्निया के कृषि उद्योग और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में उनकी मेहनत ने पहचान बनाई। जहाँ सिख गुरुद्वारों ने सेवा और भाईचारे को बढ़ावा दिया, जबकि पंजाबी संगीत और संस्कृति ने अमेरिकी समाज को समृद्ध किया है। उनका वर्चस्व प्रेरणादायक है। बराक ओबामा, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति, ने एक बार कहा था, "सिख समुदाय की सेवा और भाईचारे की भावना ने अमेरिकी समाज को बेहतर बनाया है।"

अमेरिका में भारतीय प्रतिभाएँ 
भारतीय मूल के लोग शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में भी अग्रणी हैं। अमेरिका में लगभग 17% डॉक्टर भारतीय मूल के हैं। डॉ. संजय गुप्ता, जो सीएनएन के प्रमुख चिकित्सा संवाददाता हैं, कहते हैं, "भारतीय डॉक्टरों की मेहनत और समर्पण ने अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को मजबूत बनाया है। यह समुदाय गुणवत्ता और सेवा में विश्वास करता है।"

भारतीय मूल के लोगों ने स्टार्टअप्स, रिटेल, रियल एस्टेट, और वित्तीय सेवाओं में भी अपनी छाप छोड़ी है। उदाहरणार्थ - गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई व  माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला जैसे दिग्गजों ने भारतीय मूल के होते हुए भी वैश्विक कंपनियों में नेतृत्व क्षमता का अद्वितीय प्रदर्शन किया है। तकनीकी क्षेत्र में, भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सिलिकॉन वैली में अपनी उल्लेखनीय छाप छोडी है। वेंकट रामनारायणन, जो सिलिकॉन वैली के प्रमुख निवेशक हैं, कहते हैं, "भारतीय मूल के लोग नवाचार में सबसे आगे हैं। उनकी शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों ने उन्हें तकनीकी क्षेत्र में सफल बनाया है।"

अमेरिकी कांग्रेस सदस्य राजा कृष्णमूर्ति का कहना है, "भारतीय मूल के लोगों ने न केवल व्यापारिक सफलता पाई है, बल्कि अमेरिकी समाज को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में मदद की है। उनके काम और नैतिकता ने उन्हें अमेरिकी सपने का प्रतीक बना दिया है।" भारतीय मूल के लोग अब अमेरिकी राजनीति में भी अपनी जगह बना रहे हैं। कमला हैरिस, जो भारतीय मूल की पहली उपराष्ट्रपति हैं, का चुनाव इस बात का प्रतीक है कि भारतीय समुदाय ने अमेरिका में अपनी राजनीतिक पहचान बना ली है। बराक ओबामा, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति, ने कहा था, "भारतीय समुदाय ने अमेरिकी समाज में जिस तरह का योगदान दिया है, वह अनुकरणीय है। वे न केवल मेहनती हैं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।"

अमेरिका में भारतीयों ने मनाई छठ पूजा
भारतीय जहाँ भी गए अपने साथ अपनी भाषा, भोजन और संस्कृति का भी संवहन किया है
। हमारे पूजा-पाठ, शादी-सस्कार, व्रत-त्योहार जैसे - होली, दिवाली, छठ और करवा-चौथ आदि सब अमेरिका में बड़े पैमाने पर मनाए जाते हैं। भारतीय खानपान, योग, गुजराती डंडिया और पंजाबी गिद्दा, भांगड़ा, बॉलीवुड गीत-संगीत ने भी अमेरिकी संस्कृति को समृद्ध किया है। यहाँ देशी मनोरजन के लिए आर.बी.सी रेडियो, रेडियो हमसफर, देसी जंक्शन, रेडियो सलाम नमस्ते जैसे कई हिंदी रेडियो चैनेल हैं तथा मशहूर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा, जो बॉलीवुड और हॉलीवुड दोनों में सक्रिय हैं, कहती हैं, "भारतीय संस्कृति का अमेरिकी समाज में स्वागत यह दिखाता है कि विविधता को कैसे अपनाया जा सकता है।"

अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों ने अपनी मेहनत, ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर के माध्यम से हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रहे हैं। गुजराती समुदाय का होटल उद्योग में वर्चस्व, पंजाबी समुदाय का कृषि और परिवहन में योगदान, और भारतीय पेशेवरों का तकनीकी, चिकित्सा और राजनीति में प्रभाव, यह सब भारतीयों के महती योगदान का प्रमाण है। भारतीय संस्कृति, परंपरा और संगीत, जैसे होली, दिवाली, भांगड़ा, योग और बॉलीवुड, ने अमेरिकी समाज को समृद्ध किया है। भारतीय मूल के युवा अपनी मेहनत, समर्पण और सामूहिक प्रयासों के साथ भविष्य में भारतीय समुदाय को और भी ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम होंगे। भारतीय संस्कृति और परंपराओं के साथ-साथ युवा पीढ़ी का यह निरंतर योगदान अमेरिका में भारतीय समुदाय को और भी सशक्त करेगा। व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, और राजनीति में उनका योगदान अमेरिका के विकास की कहानी का अभिन्न हिस्सा है। यह दिखाता है कि भारतीय मूल के लोग किसी भी समाज में किस तरह से प्रभावशाली और उपयोगी हो सकते हैं।

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बुधवार, 13 नवंबर 2024

उठती संस्कृति, गिरते मूल्य..!

शहरी आकर्षण में पलायन
        वर्तमान समय में शहरी संस्कृति बड़ी तेजी से विकसित हो रही है। बेहतर जीवन की लालसा में ग्रामीण शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बढ़ते शहरीकरण का प्रभाव हमारे समाज, संस्कृति, और संस्कारों पर भी परिलक्षित हो रहा है। विशेषकर, परिवारिक संरचना तेज़ी से बदल रही है। समाज में पहले जहाँ संयुक्त परिवारों की भूमिका महती थी, वहीं आज एकल परिवारों का वर्चस्व बढ़ा है। इस परिवेश में, सभी की स्थिति में बदलाव देखने को मिल रहा है। नतीजन, शहरों में भी लोग आज कहीं अधिक एकाकीपन, उपेक्षा और मानसिक तनाव के शिकार हैं।

शहरी संस्कृति में उभरते नव संस्कार -  
        संस्कार, किसी भी समाज की नींव होते हैं, जिनसे सामाजिक संतुलन और मानवता कायम रहती है। परंतु शहरी जीवन की आपाधापी और आधुनिकता की दौड़ में, पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का ह्रास हो रहा है। बच्चों को संस्कारों और परंपराओं की शिक्षा देने के लिए जिस समय और ध्यान की आवश्यकता होती है, वो अक्सर व्यस्तता के कारण नहीं मिल पाता। माता-पिता कामकाजी होते हैं और बच्चों की परवरिश में अक्सर आधुनिक सुविधाओं और शिक्षा के प्रति अधिक ध्यान देते हैं, जबकि मूल्य और संस्कार अनदेखी का शिकार हो रहे हैं। डिजिटल दुनिया में बच्चों की व्यस्तता ने भी पारिवारिक समय और संस्कारों की शिक्षा को पीछे छोड़ दिया है।

        संयुक्त परिवारों में, बच्चों को दादा-दादी, नाना-नानी जैसे बुजुर्गों से संस्कारों का सजीव उदाहरण मिलता था। लेकिन एकल परिवारों में यह पहलू सीमित हो गया है। संयुक्त परिवारों की कमी से बच्चों का उनके बुजुर्गों के साथ संपर्क कम हो गया है, जो कि संस्कारों के अभाव का एक प्रमुख कारण है। शहरीकरण के साथ ही एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ा है। लोग अपने करियर और निजी जीवन में अधिक स्वतंत्रता चाहते हैं। आज का युवा वर्ग स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है और घर के कामों में बुजुर्गों की मदद की जगह खुद सब कुछ संभालना पसंद करता है। ऐसे में, वे खुद को अपने बुजुर्ग माता-पिता से अलग रहने में ही सुखद और सुविधाजनक महसूस करते हैं। एकल परिवार में बच्चों का पालन-पोषण तो होता है, परंतु वे दादा-दादी से मिले अनुभवों और समझदारी से वंचित रह जाते हैं।

        वहीं, एकल परिवारों में बच्चों की परवरिश करने वाले माता-पिता पर अत्यधिक दबाव भी होता है। अकेलेपन में बुजुर्गों का सहारा न होने के कारण, माता-पिता को बच्चों की देखभाल, करियर और घर की जिम्मेदारियों को अकेले संभालना पड़ता है। इन सबके बीच, वे स्वयं अपने बच्चों को पर्याप्त समय और संस्कार देने में असमर्थ हो जाते हैं। संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों का विशेष स्थान होता था। वे बच्चों के लिए सलाहकार और परिवार के लिए अनुभव का खज़ाना होते थे। परंतु एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने उनके जीवन में अलगाव और उपेक्षा की भावना भर दी है। अकेलेपन के कारण वे कई मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करने लगे हैं। समाज में वृद्धाश्रमों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जो एक संकेत है कि कई परिवार अपने बुजुर्गों की देखभाल करने में असमर्थ हैं या तैयार नहीं हैं।

        बुजुर्गों का स्वास्थ्य, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य, आज बड़ी चुनौती बन गया है। अकेलापन, उपेक्षा, और दूसरों पर निर्भरता की भावना उन्हें अवसाद और अन्य मानसिक समस्याओं की ओर ले जाती है। इसके साथ ही, बुजुर्गों के पास अधिक समय होता है, परंतु उनके साथ बिताने के लिए युवा पीढ़ी के पास समय की कमी होती है। यह असंतुलन बुजुर्गों को परिवार में अलग-थलग महसूस कराता है।

        शहरी जीवन की आपाधापी और व्यक्तिगत स्वार्थों को संतुलित कर के बुजुर्गों को फिर से सम्मान और सुरक्षा देने का प्रयास किया जा सकता है। सबसे पहले, यह ज़रूरी है कि परिवारों में बच्चों को संस्कारों और बुजुर्गों के प्रति आदर की भावना सिखाई जाए। माता-पिता को भी बच्चों के साथ बुजुर्गों का समय साझा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि बच्चे दादा-दादी या नाना-नानी से जीवन के अनुभवों और संस्कारों का लाभ उठा सकें।

        सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी बुजुर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयास करने चाहिए। वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ाने की बजाय, बुजुर्गों के लिए "Day care canters" जैसी योजनाएँ लागू की जा सकती हैं, जहाँ वे अपने जैसे लोगों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी समय बिता सकें और अपने साथियों के साथ कुछ वक्त बिताकर अकेलापन दूर कर सकें।

        अंततः, समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने बुजुर्गों के प्रति समर्पण की भावना रखे, तभी हम एक संतुलित और संस्कारी समाज की कल्पना कर सकते हैं। एक ऐसा समाज जहाँ बुजुर्ग अपने अनुभवों से समाज को संवार सकें, बच्चों को संस्कार मिल सकें और सभी मिलकर एक पारिवारिक संतुलन बना सकें।

        आग्रह है कि, इस लेख को पढ़ने के बाद यदि आपको कुछ पसंद / नापसंद आया तो हमें अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, इससे हमें अपने आपमें सुधार आ अवसर मिलता है। धन्यवाद।                        
        

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