शाम का वक्त था। सूरज ढल चुका था और आसमान पर नारंगी-गुलाबी रंगों की छटा बिखर रही थी। हम दादाजी की चारपाई के पास बैठे थे, ऊपर तारों भरा आकाश और पास में मिट्टी के दीये की हल्की रोशनी टिमटिमा रही थी। रात होने को थी, और सोने से पहले की यह घड़ी कहानियों के लिए सबसे अनुकूल थी। दादाजी की आवाज़ में एक ठहराव था, जो उस शांत माहौल में और गहरा लगता था।
उस शाम, दादाजी ने रंगरेजों की कहानी शुरू की। वे बोले, "हमारे देश में रंगरेजी का काम कोई साधारण काम नहीं था, ये तो कला, विज्ञान और प्रकृति का मेल है।" उनकी बातों से पता चला कि रंगरेज—खासकर पारगी समुदाय के कारीगर हुआ करते थे। एक सादा सफ़ेद कपड़ा उनके हाथों में पड़ते ही रंगों का चमत्कार शुरू हो जाता—कभी सुर्ख लाल, कभी शीतल हरा... आदि।
“हमारे गांव में एक रंगरेज रहा करते थे, नाम था कानजी भाई। लोग कहते थे कि उसके हाथों में जादू है। वे इतने हुनरमंद थे कि तेरह मूल रंगों से तेरह हजार रंग बना सकते थे। सोचो, सिर्फ तेरह रंग! लाल, पीला, नीला, हरा—और फिर उनसे अनगिनत शेड्स। साफ-सुथरे सूती कपास के कपड़े को वो ऐसे रंग देता था कि रंग पक्के हो जाते, धूप-बारिश में भी नहीं छूटते। मैं छोटा था तो माँ मुझे लेकर उसके पास जाती थी। मैं कहता, ‘कानजी चाचा, मुझे आसमान जैसा नीला चाहिए,’ और वो हँसते हुए कहते, ‘बेटा, आसमान सा नीला तो कई रंग होते हैं, तुम्हें कौन सा चाहिए?’ फिर वो अपनी थैली से छोटी-छोटी शीशियाँ निकालते, रंगों को मिलाते, और देखते-देखते वही नीला तैयार!”
दादाजी ने एक ठंडी सांस ली और आगे बोले, “ये कोई साधारण काम नहीं था। रंगरेजी एक प्राचीन कला थी, हमारे देश की शान थी। हमारे पुरखों ने इसे पीढ़ियों तक संभालाा। लोग अपने मनपसंद कपड़े लेकर आते और कुछ दिनों बाद वे कपड़े बिल्कुल नए रंग में लौटते। यह जादू सा लगता था। वह दुकान केवल रंगने की जगह नहीं थी, बल्कि भावनाओं और यादों का अड्डा हुआ करती थी। उस समय फैशन का इतना जोर नहीं था, बल्कि वस्त्रों का रंग और उनकी गुणवत्ता अधिक मायने रखती थी। रंगरेजों की यह कला तब समाज के हर वर्ग में सम्मान पाती थी कपड़े को पहले धोया जाता, फिर प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता — हल्दी से पील, नारंगी, नीम से हरा, चंदन से भूरा। हर रंग की अपनी कहानी थी। पारगी चाचा बताते थे कि उनके दादा-परदादा अंग्रेजों के जमाने में भी नवाबों के लिए कपड़े रंगते थे। उनके रंगे हुए दुपट्टे और साड़ियां दूर-दूर तक मशहूर थीं।”
मैंने पूछा, “दादाजी, फिर आजकल ऐसा क्यों नहीं होता?” दादाजी का चेहरा थोड़ा उदास हो गया। “बेटा, वक्त बदल गया। फैशन की दुनिया ने इस कला को हाशिए पर ला दिया। पहले लोग अपने मनपसंद रंग चुनते थे, रंगरेज से रंगवाते थे। अब तो बाजार में तैयार कपड़े मिलते हैं—सस्ते, चटकीले, मशीनों से बने। रंगरेज की मेहनत, उसकी कला, सब पीछे छूट गई। पारगी चाचा का बेटा भी अब शहर में मजदूरी करता है। उसकी दुकान पर ताला लटक गया।”
दादाजी की बातों में एक दर्द था, पर उनकी आवाज में गर्व भी था। “फिल्मों ने भी रंगरेजों को याद किया है। ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ या ‘रंगरेजवा, रंग दे मोरी चुनरिया’ जैसे गीत सुनते हो न? ये सब उसी कला की याद दिलाते हैं। पर अब ये सिर्फ गीतों में बचा है। पहले हर गली में एक रंगरेज होता था, अब ढूंढने से भी नहीं मिलता।”
“तो क्या ये कला खत्म हो जाएगी, दादाजी?” रिया ने मासूमियत से पूछा। दादाजी मुस्कुराए, “नहीं बेटी, खत्म नहीं होगी, अगर हम इसे जिंदा रखें। ये हमारी विरासत है। तुम कल्पना करो—अगर तुम अपनी पसंद का रंग चुनो, और कोई उसे कपड़े पर उतारे, वो भी हाथ से, कितना खास होगा न? आज भी कुछ लोग इस कला को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। प्राकृतिक रंगों का चलन फिर से शुरू हो रहा है। शायद भविष्य में ये दोबारा फले-फूले।”
उस दिन दादाजी की बातें मेरे मन में रंगों की तरह बस गईं। रंगरेज सिर्फ कपड़े नहीं रंगता, वो सपनों को रंग देता है। फैशन की चकाचौंध में हमने इसे भुला दिया, पर शायद अभी वक्त है। दादाजी की आंखों की चमक और उनकी कहानी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया—क्या हम इस कला को फिर से जगा सकते हैं? शायद हां, अगर हम चाहें।
लेकिन फिर समय बदल गया। शाम की ठंडी हवा की तरह आधुनिकता की तेज़ लहरें आईं और इस कला को पीछे धकेल दिया। मशीनों ने हाथ की कारीगरी को मात दी, और सिंथेटिक रंगों ने प्राकृतिक रंगों को दबा दिया। हमारे मोहल्ले का वह रंगरेज, जिसकी दुकान कभी शाम को लोगों की चहल-पहल से गूँजती थी, अब खामोश-सा रहने लगा।
उस शाम, जब कहानी खत्म हुई, तो चाँद आसमान में चमक रहा था। दादाजी की बातें मन में गूँज रही थीं। आज जब पर्यावरण की चिंता बढ़ रही है और टिकाऊ फैशन की बात हो रही है, तो लगता है कि शायद ये रंगरेजी फिर से अपनी जगह बना सकते हैं। उनकी यह कहानी सिर्फ रंगों की नहीं थी, बल्कि एक पूरे युग, एक विरासत और एक जीवनशैली की थी।