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बुधवार, 26 मार्च 2025

🎨 रंगरेज की रंगीन दुनिया: परंपरा, प्रकृति और हुनर का संगम 🎨

प्रंगरेज: परंपरा, प्रकृति और मन की रंगीन दुनिया
"ऐ रंगरेज़ मेरे ऐ रंगरेज़ मेरे, ये बात बता रंगरेज़ मेरे
ये कौन से पानी में तूने, कौन सा रंग घोला है
कि दिल बन गया सौदाई, मेरा बसंती चोला है"
दादाजी की कहानी
रंगरेजों की कहानी सुनते दादा जी

शाम का वक्त था। सूरज ढल चुका था और आसमान पर नारंगी-गुलाबी रंगों की छटा बिखर रही थी। हम दादाजी की चारपाई के पास बैठे थे, ऊपर तारों भरा आकाश और पास में मिट्टी के दीये की हल्की रोशनी टिमटिमा रही थी। रात होने को थी, और सोने से पहले की यह घड़ी कहानियों के लिए सबसे अनुकूल थी। दादाजी की आवाज़ में एक ठहराव था, जो उस शांत माहौल में और गहरा लगता था।

उस शाम, दादाजी ने रंगरेजों की कहानी शुरू की। वे बोले, "हमारे देश में रंगरेजी का काम कोई साधारण काम नहीं था, ये तो कला, विज्ञान और प्रकृति का मेल है।" उनकी बातों से पता चला कि रंगरेज—खासकर पारगी समुदाय के कारीगर हुआ करते थे। एक सादा सफ़ेद कपड़ा उनके हाथों में पड़ते ही रंगों का चमत्कार शुरू हो जाता—कभी सुर्ख लाल, कभी शीतल हरा... आदि।

“हमारे गांव में एक रंगरेज रहा करते थे, नाम था कानजी भाई। लोग कहते थे कि उसके हाथों में जादू है। वे इतने हुनरमंद थे कि तेरह मूल रंगों से तेरह हजार रंग बना सकते थे। सोचो, सिर्फ तेरह रंग! लाल, पीला, नीला, हरा—और फिर उनसे अनगिनत शेड्स। साफ-सुथरे सूती कपास के कपड़े को वो ऐसे रंग देता था कि रंग पक्के हो जाते, धूप-बारिश में भी नहीं छूटते। मैं छोटा था तो माँ मुझे लेकर उसके पास जाती थी। मैं कहता, ‘कानजी चाचा, मुझे आसमान जैसा नीला चाहिए,’ और वो हँसते हुए कहते, ‘बेटा, आसमान सा नीला तो कई रंग होते हैं, तुम्हें कौन सा चाहिए?’ फिर वो अपनी थैली से छोटी-छोटी शीशियाँ निकालते, रंगों को मिलाते, और देखते-देखते वही नीला तैयार!”

दादाजी ने एक ठंडी सांस ली और आगे बोले, “ये कोई साधारण काम नहीं था। रंगरेजी एक प्राचीन कला थी, हमारे देश की शान थी। हमारे पुरखों ने इसे पीढ़ियों तक संभालाा। लोग अपने मनपसंद कपड़े लेकर आते और कुछ दिनों बाद वे कपड़े बिल्कुल नए रंग में लौटते। यह जादू सा लगता था। वह दुकान केवल रंगने की जगह नहीं थी, बल्कि भावनाओं और यादों का अड्डा हुआ करती थी। उस समय फैशन का इतना जोर नहीं था, बल्कि वस्त्रों का रंग और उनकी गुणवत्ता अधिक मायने रखती थी। रंगरेजों की यह कला तब समाज के हर वर्ग में सम्मान पाती थी कपड़े को पहले धोया जाता, फिर प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता — हल्दी से पील, नारंगी, नीम से हरा, चंदन से भूरा। हर रंग की अपनी कहानी थी। पारगी चाचा बताते थे कि उनके दादा-परदादा अंग्रेजों के जमाने में भी नवाबों के लिए कपड़े रंगते थे। उनके रंगे हुए दुपट्टे और साड़ियां दूर-दूर तक मशहूर थीं।”

मैंने पूछा, “दादाजी, फिर आजकल ऐसा क्यों नहीं होता?” दादाजी का चेहरा थोड़ा उदास हो गया। “बेटा, वक्त बदल गया। फैशन की दुनिया ने इस कला को हाशिए पर ला दिया। पहले लोग अपने मनपसंद रंग चुनते थे, रंगरेज से रंगवाते थे। अब तो बाजार में तैयार कपड़े मिलते हैं—सस्ते, चटकीले, मशीनों से बने। रंगरेज की मेहनत, उसकी कला, सब पीछे छूट गई। पारगी चाचा का बेटा भी अब शहर में मजदूरी करता है। उसकी दुकान पर ताला लटक गया।”

दादाजी की बातों में एक दर्द था, पर उनकी आवाज में गर्व भी था। “फिल्मों ने भी रंगरेजों को याद किया है। ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ या ‘रंगरेजवा, रंग दे मोरी चुनरिया’ जैसे गीत सुनते हो न? ये सब उसी कला की याद दिलाते हैं। पर अब ये सिर्फ गीतों में बचा है। पहले हर गली में एक रंगरेज होता था, अब ढूंढने से भी नहीं मिलता।”

“तो क्या ये कला खत्म हो जाएगी, दादाजी?” रिया ने मासूमियत से पूछा। दादाजी मुस्कुराए, “नहीं बेटी, खत्म नहीं होगी, अगर हम इसे जिंदा रखें। ये हमारी विरासत है। तुम कल्पना करो—अगर तुम अपनी पसंद का रंग चुनो, और कोई उसे कपड़े पर उतारे, वो भी हाथ से, कितना खास होगा न? आज भी कुछ लोग इस कला को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। प्राकृतिक रंगों का चलन फिर से शुरू हो रहा है। शायद भविष्य में ये दोबारा फले-फूले।”

उस दिन दादाजी की बातें मेरे मन में रंगों की तरह बस गईं। रंगरेज सिर्फ कपड़े नहीं रंगता, वो सपनों को रंग देता है। फैशन की चकाचौंध में हमने इसे भुला दिया, पर शायद अभी वक्त है। दादाजी की आंखों की चमक और उनकी कहानी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया—क्या हम इस कला को फिर से जगा सकते हैं? शायद हां, अगर हम चाहें।

लेकिन फिर समय बदल गया। शाम की ठंडी हवा की तरह आधुनिकता की तेज़ लहरें आईं और इस कला को पीछे धकेल दिया। मशीनों ने हाथ की कारीगरी को मात दी, और सिंथेटिक रंगों ने प्राकृतिक रंगों को दबा दिया। हमारे मोहल्ले का वह रंगरेज, जिसकी दुकान कभी शाम को लोगों की चहल-पहल से गूँजती थी, अब खामोश-सा रहने लगा।

उस शाम, जब कहानी खत्म हुई, तो चाँद आसमान में चमक रहा था। दादाजी की बातें मन में गूँज रही थीं। आज जब पर्यावरण की चिंता बढ़ रही है और टिकाऊ फैशन की बात हो रही है, तो लगता है कि शायद ये रंगरेजी फिर से अपनी जगह बना सकते हैं। उनकी यह कहानी सिर्फ रंगों की नहीं थी, बल्कि एक पूरे युग, एक विरासत और एक जीवनशैली की थी।

संरक्षण के प्रयास: समस्या और समाधान

हर साल विभिन्न मंचों पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर सम्मेलन होते हैं, लेकिन इनका प्रभाव सीमित ही नजर आता है।

"स्वदेशी पहने, उधोग बचाएँ।"

रविवार, 23 मार्च 2025

🌙 चाँद के पार चलो: चन्द्रमा तक की एक काल्पनिक यात्रा🌍

आधुनिक शिक्षा प्रणाली और 64 कलाएँ: सर्वांगीण विकास की आवश्यकताा

एक सुनहरी सुबह, जब सूरज की किरणें धरती पर बिखर रही थीं, भारत के एक छोटे से शहर के स्कूल में हलचल मची थी। इसरो (ISRO - Indian Space Research Organisation) ने एक खास मिशन की घोषणा की थी - "चंद्रयान-प्रेरणा"। इस मिशन में पाँच उत्साही छात्रों - रिया, आरव, सौम्या, सिद्धांत और मान्या - को चन्द्रमा की सैर पर ले जाया जाना था। ये बच्चे भूगोल और अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति अपनी जिज्ञासा के लिए चुने गए थे। उनकी आँखों में सपने थे और मन में सवालों का अथाह समंदर। अंतरिक्ष यान तैयार था। इसरो के वैज्ञानिक डॉ. अनिल और डॉ. स्मिता बच्चों को समझा रहे थे, "ये यान चन्द्रमा तक 3,84,400 किलोमीटर की यात्रा करेगा। इसमें हमें तीन दिन लगेंगे।" आरव ने तुरंत पूछा, "लेकिन गुरुत्वाकर्षण हमें नीचे क्यों नहीं खींचेगा?" डॉ. स्मिता मुस्कुराईं और बोलीं, "अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण बहुत कम होता है। हमारा यान रॉकेट की श क्ति से पृथ्वी के गुरुत्व को पार कर लेगा।" बच्चों की आँखें चमक उठीं।

तीन दिन बाद, जब यान चन्द्रमा की सतह पर उतरा, बच्चों ने बाहर झाँका। चारों ओर धूसर मिट्टी, गहरे गड्ढे और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ दिखे। रिया ने उत्साह से कहा, "ये तो चंदा मामा की कहानियों से बिल्कुल अलग है!" डॉ. अनिल हँसे, "हाँ, चंदा मामा एक कविता है, पर असल चन्द्रमा एक उपग्रह है जो पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है। यहाँ न पानी है, न हवा, और न ही जीवन।" बच्चों ने अपने अंतरिक्ष सूट पहने और चन्द्रमा की सतह पर कदम रखा। कम गुरुत्वाकर्षण के कारण वे उछल-उछल कर चल रहे थे। सौम्या ने पूछा, "ये गड्ढे कैसे बने?" डॉ. स्मिता ने बताया, "ये उल्कापिंडों के टकराने से बने हैं। चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं है, इसलिए उल्काएँ सीधे सतह से टकराती हैं।" सिद्धांत ने दूरबीन उठाई और बोला, "वहाँ देखो! क्या वो धरती है?" दूर नीला-हरा गोला चमक रहा था। डॉ. अनिल ने कहा, "हाँ, ये हमारा घर है। पृथ्वी का 71% हिस्सा पानी से ढका है, इसलिए ये नीली दिखती है।"

बच्चों ने आसपास देखा। मान्या ने चिल्लाकर कहा, "वो देखो! वह लाल गोला क्या है?" डॉ. स्मिता ने समझाया, "अरे! वह तो मंगल ग्रह है। इसका लाल रंग वहाँ की मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड की वजह से है।" आरव ने जोड़ा, "और वहाँ जो चमक रहा है, क्या वो बृहस्पति है?" डॉ. अनिल ने हामी भरी, "बिल्कुल! बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है, जो गैस से बना है।"चन्द्रमा पर चलते हुए बच्चे धरती को निहारते रहे। रिया ने कहा, "हमारी धरती कितनी सुंदर है! यहाँ से देखो तो लगता है, इसे बचाना कितना ज़रूरी है।" डॉ. स्मिता ने गंभीरता से कहा, "सही कहा। चन्द्रमा पर नदियाँ, जंगल या हवा नहीं है। हमारी धरती का हर पेड़, हर बूँद अनमोल है।"

वापसी की तैयारी करते हुए सिद्धांत ने पूछा, "क्या हम कभी चन्द्रमा पर घर बना सकते हैं?" डॉ. अनिल ने जवाब दिया, "शायद हाँ। लेकिन इसके लिए हमें ऑक्सीजन, पानी और ऊर्जा की व्यवस्था करनी होगी। विज्ञान इसे संभव बना सकता है।" जब यान वापस पृथ्वी की ओर बढ़ा, बच्चों के मन में चंदा मामा की कविताएँ नहीं, बल्कि चन्द्रमा का असल चेहरा बस गया था। उन्हें समझ आ गया था कि भूगोल और विज्ञान हमें ब्रह्मांड के रहस्य खोलने की चाबी देते हैं। धरती पर लौटते ही सौम्या ने कहा, "अब मैं वैज्ञानिक बनूँगी और अंतरिक्ष के और राज़ जानूँगी!" बाकी बच्चे भी मुस्कुराए, क्योंकि उनकी जिज्ञासा अब सपनों को पंख दे चुकी थी।

शनिवार, 22 मार्च 2025

झजरिया: संस्कृति की सुगंध और परंपरा की मिठास भरी कहानी

झजरिया: संस्कृति की सुगंध और परंपरा की मिठास भरी कहानी

दादी सुनाती, झजरिया की कहानी  

गर्मियों की छुट्टियाँ थीं। सूरज ढल चुका था और आंगन में ठंडी हवा बह रही थी। दादी अपनी आराम कुर्सी पर बैठी थीं, और उनके चारों ओर बच्चे गोल घेरा बनाए बैठे थे। चाँदनी रात में तारे टिमटिमा रहे थे, और दूर कहीं से मेंढकों की टर्र-टर्र सुनाई दे रही थी।

दादी ने मुस्कुराते हुए कहा, "बच्चों, आज मैं तुम्हें एक अनोखी मिठाई की कहानी सुनाऊंगी। यह सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और प्यार का स्वाद है। इसे कहते हैं - झजरिया! झजरिया हमारे राजस्थान और मध्य प्रदेश की एक पारंपरिक मिठाई है, जो खासतौर पर तीज जैसे त्योहारों पर बनाई जाती है। तीज का त्योहार बारिश के मौसम के आगमन का प्रतीक है, और ऐसे समय में झजरिया बनाना हमारी परंपरा का हिस्सा है। यह मिठाई न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि हमारे कृषि विरासत का भी प्रतीक है, क्योंकि इसमें ताज़ा मकई का इस्तेमाल किया जाता है, जो हमारे खेतों की उपज है।"

बच्चों की आँखों में जिज्ञासा चमक उठी। "दादी, यह झजरिया क्या होता है?" छोटे राहुल ने पूछा।

दादी ने हँसते हुए कहा, "बहुत साल पहले, जब मैं छोटी थी, हमारे खेतों में मकई के भुट्टे खूब होते थे। बारिश की पहली फुहार के साथ खेतों में हरियाली छा जाती थी। तब तुम्हारी परनानी ताज़े भुट्टों से झजरिया बनाया करती थीं। वे भुट्टों को कद्दूकस करके देसी घी में धीरे-धीरे भूनतीं। घी में भुट्टे के कण धीरे-धीरे सुनहरे होते जाते थे, और उनकी महक पूरे घर में फैल जाती थी। फिर दूध डालकर उसे गाढ़ा होने तक पकाया जाता था, और अंत में गुड़ या शक्कर मिलाकर इलायची और मेवों से सजाया जाता था।"

"फिर इसे बनाया कैसे जाता था, दादी?" सबसे बड़ी पोती, नीला ने उत्सुकता से पूछा।

दादी ने ठहरकर कहा, "अच्छा, तो ध्यान से सुनो... सबसे पहले ताज़े भुट्टों को कद्दूकस किया जाता था। फिर एक कढ़ाई में देसी घी गरम कर उसमें कद्दूकस किया हुआ भुट्टा डाला जाता था और मध्यम आँच पर भूना जाता था। जब भुट्टा हल्का सुनहरा हो जाता, तो उसमें दूध डालकर धीमी आँच पर पकाया जाता था। जब दूध गाढ़ा हो जाता, तो उसमें गुड़ या शक्कर मिलाई जाती थी। ऊपर से इलायची पाउडर और कटे हुए मेवे डालकर इसे और स्वादिष्ट बनाया जाता था। जब झझरिया हलवे जैसा गाढ़ा हो जाता, तब इसे गरमा-गरम परोसा जाता था।"

बच्चों के मुँह में पानी आ गया। "वाह दादी! इसका स्वाद तो बहुत मज़ेदार होगा! लेकिन इसे कब बनाया जाता था?" मीनू ने पूछा।

दादी बोलीं, "हम इसे खास मौकों पर बनाते थे। बारिश के मौसम में, तीज-त्योहारों पर, और जब घर में कोई अच्छा काम होता था, तब झजरिया बनाया जाता था। यह बहुत सेहतमंद भी होता था, इसलिए बड़े-बुजुर्ग भी इसे बहुत पसंद करते थे।"

बच्चों ने चहकते हुए कहा, "दादी, अब हमें झजरिया कहाँ मिलेगा? हम भी खाना चाहते हैं!"

दादी ने हँसते हुए कहा, "अब तो यह मिठाई बहुत कम देखने को मिलती है। लेकिन राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ पारंपरिक भोजनालयों में इसे बनाया जाता है। गाँव के मेलों में भी इसे बेचा जाता है। मगर क्यों न हम इसे खुद बनाएं? इससे हम न केवल इस मिठाई का स्वाद चखेंगे, बल्कि हमारी परंपरा को भी जिंदा रखेंगे।"

बच्चों की खुशी का ठिकाना न रहा। "हाँ! चलो झजरिया बनाते हैं!" वे सब खुशी से चिल्लाए।

दादी मुस्कुराईं और बोलीं, "बच्चों, झजरिया सिर्फ एक मिठाई नहीं, यह हमारे परिवार की परंपरा, हमारे प्यार और सादगी की मिठास है। यह हमें सिखाती है कि हर छोटी चीज़ में भी आनंद छुपा होता है। अब जब तुम बड़े हो जाओगे, तो इसे अपने बच्चों को भी सिखाना।"

बच्चों ने खुशी-खुशी सिर हिलाया। "ज़रूर, दादी! अब हम भी झजरिया बनाएंगे और अपने दोस्तों को भी खिलाएंगे!"

चाँदनी रात में दादी की मीठी कहानी और झजरिया की मिठास ने बच्चों के दिलों में एक खास जगह बना ली। उन्होंने समझा कि झजरिया सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि उनकी परंपरा, प्यार और सादगी की मिठास है। यह उन्हें सिखाती है कि हर छोटी चीज़ में भी आनंद छुपा होता है, और यह आनंद पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है।

💬 हमें कमेंट में जरूर  बताइए, 'झजरिया मिठाई' आपने कब खाई है? आपकी यादें हमारे साथ साझा करें! 😊👇

बुधवार, 21 सितंबर 2022

ग्लोबल🌏वार्मिंग: एक गंभीर संकट और हमारा दायित्व

ग्लोबल🌏वार्मिंग
"प्रकृति से खिलवाड़ का परिणाम,
विनाश की ओर बढ़ता इंसान।"

वर्तमान युग में वैश्विक तापमानGlobal Warming: पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ना में निरंतर वृद्धि हमारे पर्यावरण के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी है। ग्लोबल वार्मिंग न केवल पृथ्वी के तापमान को बढ़ा रही है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के असामान्य चक्र को भी जन्म दे रही है। हर वर्ष, हम देश के विभिन्न हिस्सों में अत्यधिक बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं, जिससे व्यापक स्तर पर जन-धन की हानि हो रही है। यह स्पष्ट संकेत है कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ चुका है और यदि इसे समय रहते नहीं सुधारा गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ भयावह परिस्थितियों का सामना करेंगी। अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर खड़ी हैं। कभी घर-आँगन में चहचहाने वाली गौरैया आज विरले ही दिखाई देती है। कौवे और गिलहरियाँ भी अब कम नजर आती हैं। वनों के नष्ट होने से ये जीव-जंतु मानव बस्तियों की ओर भाग रहे हैं, जहाँ वे या तो मारे जाते हैं या फिर मनुष्यों के लिए खतरा बन जाते हैं। यह मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को जन्म दे रहा है।

वनों का विनाश और जीव-जंतुओं का संकट

वनों की अंधाधुंध कटाई का प्रभाव केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक साबित हो रही है जो अपने प्राकृतिक आवासों से वंचित हो रहे हैं।

पर्यावरण

आदिवासी समुदायों पर प्रभाव

जंगलों के कटने से सबसे अधिक प्रभावित वे समुदाय हो रहे हैं जो सदियों से इन वनों पर आश्रित हैं। आदिवासी समाज न केवल वनों से अपनी आजीविका चलाते हैं, बल्कि वे इनकी रक्षा भी करते आए हैं। परंतु तथाकथित विकास के नाम पर उन्हें विस्थापित किया जा रहा है, जिससे उनकी परंपरागत जीवनशैली पर संकट गहराता जा रहा है। उनके प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास न केवल उनके जीवन को कठिन बना रहा है, बल्कि सामाजिक अशांति को भी जन्म दे रहा है, जिसका परिणाम हमें कई क्षेत्रों में नक्सलवाद जैसी समस्याओं के रूप में देखने को मिल रहा है।

"यदि वृक्ष नहीं, तो श्वास नहीं।"

पर्यावरणीय असंतुलन और मानव अस्तित्व पर संकट

वनों की कटाई ने केवल पारिस्थितिकी को क्षति पहुँचाई है, बल्कि भू-क्षरण और मरुस्थलीकरण को भी बढ़ावा दिया है। यह प्रक्रिया धरती की उर्वरता को नष्ट कर रही है, जिससे कृषि उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। जल संकट भी इसी का एक गंभीर परिणाम है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो भविष्य में मानव जाति के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो सकता है।

संरक्षण के प्रयास: समस्या और समाधान

हर साल विभिन्न मंचों पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर सम्मेलन होते हैं, लेकिन इनका प्रभाव सीमित ही नजर आता है। वृक्षारोपण कार्यक्रम कागजों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। हम पेड़ तो लगाते हैं, परंतु उनके संरक्षण की ओर ध्यान नहीं देते। यह समय केवल नारे लगाने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है।

हमारा दायित्व

ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए हमें व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर पहल करनी होगी। वृक्षारोपण के साथ-साथ जल संरक्षण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना समय की माँग है। यदि हम प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें और सामूहिक रूप से कार्य करें, तो इस संकट से उबर सकते हैं।

"धरती बचाओ, जीवन बचाओ।"

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