विचारों का विरोध, आत्माओं का संवाद
— महात्मा गांधी की दृष्टि से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर
जब मैं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का स्मरण करता हूँ, तो मेरे मन में किसी महान कवि की नहीं, बल्कि एक जाग्रत अंतरात्मा की छवि उभरती है। उनसे मेरी भेंट से बहुत पहले ही वे विश्वपटल पर प्रतिष्ठित हो चुके थे। सन् 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर वे भारत ही नहीं, पूरे विश्व के कवि बन चुके थे।
हमारी भेंट में कहीं भी श्रेष्ठता या औपचारिकता का भाव नहीं था। गुरुदेव ने मुझे ‘महात्मा’ कहा—यह संबोधन मेरे लिए गौरव का नहीं, आत्मपरीक्षण का कारण बना। मैंने उन्हें ‘गुरुदेव’ कहा, क्योंकि उनके शब्द मुझे आदेश नहीं, दृष्टि देते थे।
हमारे विचार कई बार भिन्न थे। राष्ट्रवाद और स्वदेशी के प्रश्न पर गुरुदेव को भय था कि कहीं मनुष्य विचारों की संकीर्णता में न बंध जाए। मैंने उनकी असहमति को विरोध नहीं, चेतावनी की तरह स्वीकार किया।
1919 के जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के बाद जब गुरुदेव ने ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी, तब यह स्पष्ट हो गया कि कविता और कर्म का स्रोत एक ही नैतिक भूमि से निकलता है।
शांतिनिकेतन जाकर मैंने शिक्षा का वह रूप देखा, जो भय से मुक्त करता है। गुरुदेव चाहते थे कि मनुष्य पहले मनुष्य बने, फिर नागरिक।
इन दोनों विचारधाराओं के बीच सेतु बने काका कालेलकर, जिनके संस्मरण यह सिद्ध करते हैं कि हमारा विरोध आत्मिक दूरी नहीं, बल्कि विचारों का संवाद था।
आज जब मैं इस संबंध को स्मरण करता हूँ, तो अनुभव करता हूँ—यदि मेरे जीवन में संघर्ष ने दिशा दी, तो गुरुदेव ने उसे आत्मा दी। यही संवाद भारत की सच्ची धरोहर है।
✍️ अरविंद बारी
IndiCoach
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