शनिवार, 29 मार्च 2025

🐦‍⬛पपीहे की पुकार: विरह, प्रतीक्षा और प्रेम की शाश्वत गाथा! 🪶

पपीहा (चातक) पक्षी 
भारतीय उपमहाद्वीप के आकाश में गूँजने वाली मधुर ध्वनियों में यदि कोई सबसे अधिक करुण, सबसे अधिक प्रतीक्षारत और सबसे अधिक गूढ़ अर्थों से भरी है, तो वह पपीहे का स्वर है। यह स्वर मानो किसी बिछड़े हुए प्रेमी की पुकार हो, जो अनंत आकाश की गोद में खोए अपने प्रियतम को आवाज़ देता हो। यह पक्षी अपनी विलक्षण प्रकृति के कारण न केवल लोकमानस में बल्कि साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण में भी विशेष स्थान रखता है।

पपीहा, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Hierococcyx varius कहते हैं, भारत के घने वनों, उपवनों और गाँवों में पाया जाता है। यह वही पक्षी है, जिसे भारतीय मानस ने वर्षा ऋतु का अग्रदूत कहा है। जैसे ही आकाश में काले बादल उमड़ने लगते हैं, इसकी कुहू-कुहू ध्वनि वातावरण में गूंज उठती है, मानो किसी विरहिणी के मन की व्यथा अभिव्यक्त कर रही हो। लोककथाओं में इसे अमृत की बूँद के लिए तरसने वाला पक्षी कहा गया है, जो केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा की पहली बूँद को ही ग्रहण करता है। यह प्रतीक है संकल्प और आदर्श की पराकाष्ठा का, एक ऐसे पथिक का जो केवल अपने उच्चतम लक्ष्य के लिए तत्पर है।

अक्सर इसे कोयल के समान समझने की भूल की जाती है, किंतु दोनों भिन्न प्रजातियाँ हैं। कोयल (Eudynamys scolopaceus) गहरे काले रंग की होती है और उसकी 'कू-कू' ध्वनि वसंत का संकेत देती है, जबकि पपीहा भूरे रंग का होता है और उसकी करुण पुकार 'पियू-पियू' या 'पियू कहे' वर्षा ऋतु में गूँजती है। जहाँ कोयल प्रेम और उल्लास की प्रतीक है, वहीं पपीहा विरह और प्रतीक्षा का प्रतीक माना जाता है।

भारतीय काव्यधारा में पपीहा प्रेम, वियोग और प्रतीक्षा का प्रतीक बनकर उभरा है। भक्तिकाल के संत कवियों ने इसे आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी का प्रतीक माना। मीराबाई की भजनमालाओं में इसकी ध्वनि साधक के अंतःकरण में उठते विरह-भाव को स्वर देती है। सूरदास की कविताओं में यह गोपियों के हृदय की व्याकुलता का पर्याय बनता है। आधुनिक हिंदी कविता में महादेवी वर्मा ने इसे स्त्री हृदय की अनुगूंज के रूप में उकेरा है। प्रसिद्ध साहित्यकार हज़ारी प्रसाद द्विवेदी पपीहे को प्रतीक्षा और समर्पण की पराकाष्ठा का प्रतीक मानते थे। उनके अनुसार, "पपीहा केवल एक पक्षी नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का वह अंश है, जो प्रेम और अनुराग की परिधि में विचरता है। इसकी ध्वनि हमारी परंपराओं में गूँजती है।"¹

पपीहा मानो प्रतीक्षा की भाषा है, जो न केवल प्रेम की अभिव्यक्ति करता है, बल्कि संयम, एकनिष्ठता और समर्पण का भी प्रतीक बन जाता है। भारतीय संस्कृति में पपीहे का उल्लेख केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। लोकगीतों में यह उस प्रिय की याद दिलाने वाला स्वर है, जो दूर परदेश गया है और जिसकी प्रतीक्षा में नायिका सावन के हर दिन को आंसुओं में गिन रही है। यह स्वर किसी व्याकुल हृदय के अधीर प्रेम का प्रतीक है, जो हर आहट में अपने प्रियतम को खोजता है। लोककथाओं में इसे सच्चे प्रेम और तपस्या के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है।

"बूंद-बूंद को तरसे प्यासा, स्वाति जल ही पीता, बिछुड़न की पीर में खोया, नभ को ताके रीता।"

महाकवि कालिदास ने ऋतुसंहार में पपीहे की पुकार को विरहिणी की वेदना के समान बताते हुए लिखा है कि यह पक्षी प्रेम की तीव्रता और एकनिष्ठता का अद्वितीय उदाहरण है। उनके अनुसार, "पपीहे की पुकार उस अनंत प्रतीक्षा का प्रतीक है, जिसे केवल प्रेम की गहन अनुभूति ही समझ सकती है।"² किन्तु आज यह पक्षी संकट में है। जंगलों की कटाई, कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग और जलवायु परिवर्तन इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके हैं। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने कहा था, "प्रकृति की हर ध्वनि एक भाषा है, और पपीहे की करुण पुकार हमें यह बताने के लिए पर्याप्त है कि प्रकृति संकट में है। हमें इसे बचाने के लिए तुरंत प्रयास करने होंगे।"³

इसके संरक्षण के लिए हमें प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना होगा, वृक्षारोपण को बढ़ावा देना होगा और जैविक कृषि को अपनाना होगा। यह केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक ऐसा अंश है, जिसे बचाना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है। पपीहे की करुण पुकार केवल एक पक्षी की आवाज़ नहीं, बल्कि मानव हृदय की गहनतम अनुभूतियों का प्रतीक है। इसकी पुकार हमें प्रेम, प्रतीक्षा और समर्पण की गूढ़ भाषा सिखाती है। जब तक यह स्वर हमारे जंगलों में गूंजता रहेगा, तब तक प्रेम और प्रतीक्षा की इस शाश्वत गाथा का अस्तित्व बना रहेगा।

संदर्भ:

  1. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, अशोक के फूल, 1955। 
  2. कालिदास, ऋतुसंहार, तृतीय सर्ग। 
  3. सलीम अली, द बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स, 1941।

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