सोमवार, 18 नवंबर 2024

युवाओं की उड़ान, स्टार्टअप के नाम...! (साक्षात्कार)

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भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र आज दुनिया भर में अपनी पहचान बना रहा है। यह सफर आसान नहीं था, लेकिन युवाओं की कड़ी मेहनत, सशक्त विचारों और दृढ़ संकल्प ने इसे संभव बनाया। रेडबस जैसी सफल कहानियां इस बात का प्रमाण हैं कि यदि किसी के पास समस्या का समाधान करने का जज़्बा और तकनीक का सही इस्तेमाल हो, तो कोई भी विचार दुनिया के सामने अपनी पहचान बना सकता है।

फणींद्र सामा
2006 में, तीन युवा इंजीनियर, फणींद्र सामा, सुधाकर पसुपुनुरी और चरण पद्माराजू ने रेडबस की शुरुआत की। इनकी शुरुआत महज ₹5 लाख की पूंजी से हुई। रेडबस का विचार उस समय आया जब फणींद्र सामा को त्योहार के समय अपने गृहनगर की यात्रा के लिए बस टिकट बुक करने में कठिनाई हुई। इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए, उन्होंने तकनीक और नवाचार का सहारा लिया और एक ऐसा मंच तैयार किया जिसने भारत में बस टिकट बुकिंग के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया।

रेडबस ने अपनी यात्रा में कई मील के पत्थर छुए। इसकी सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण 2013 में देखने को मिला, जब इसे 828 करोड़ रुपये में एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी द्वारा अधिग्रहित किया गया। इस सफलता ने न केवल भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि यह भी दिखाया कि अगर सही दृष्टिकोण और मेहनत हो, तो कोई भी विचार वैश्विक स्तर पर पहचान बना सकता है।

फणींद्र सामा के नेतृत्व ने रेडबस को एक नई पहचान दी। सामा ने न केवल रेडबस को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि समाज सेवा में भी अपना योगदान दिया। उन्होंने तेलंगाना राज्य के मुख्य नवाचार अधिकारी के रूप में भी कार्य किया, जहां उन्होंने शासन में नवाचार और प्रौद्योगिकी के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दिया। उनकी यह यात्रा इस बात का उदाहरण है कि एक सफल उद्यमी समाज की भलाई के लिए भी योगदान कर सकता है।

रेडबस की सफलता की कहानी युवाओं के लिए कई प्रेरणाएं छोड़ती है। यह हमें यह सिखाती है कि यदि हमारे पास एक बेहतरीन विचार है, तो उसे आगे बढ़ाने के लिए हिम्मत दिखाना जरूरी है। हर बड़ा स्टार्टअप एक साधारण समस्या के समाधान से शुरू होता है। इसके लिए जरूरी है कि आप समस्या को पहचानें, सही टीम का चयन करें और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें।

भारत के पास आज विश्वस्तरीय तकनीक, प्रतिभाशाली युवा, और समर्थन करने वाले निवेशक हैं। युवाओं के लिए यह समय अपने सपनों को साकार करने और दुनिया को अपनी पहचान दिखाने का है। 'रेडबस' जैसी कहानियां हमें यही सिखाती हैं कि अगर आपके पास एक विचार है और उसे साकार करने का जज़्बा है, तो आप न केवल अपनी, बल्कि देश की भी दिशा और दशा बदल सकते हैं।


साक्षात्कार लेखन
अभ्यास प्रश्न -  मान लीजिये की हाल ही में आपकी मुलाक़ात प्रसिद्ध उद्यमी श्री फणींद्र सामा जी से हुई थी  उपरोक्त पढ़े गए आलेख के आधार पर उनसे हुई आपकी बातचीत को साक्षात्कार के स्वरूप लिखिए 
FAQs

मशहूर उद्योगपति फणींद्र सामा से साक्षात्कार

प्रश्न 1: सर, कृपया अपने बारे में संक्षेप में बताएं।
उत्तर - मैं फणींद्र सामा, "रेडबस" का सह-संस्थापक हूं। मैंने अपनी शिक्षा आईआईटी मद्रास से पूरी की और यात्रा उद्योग में बदलाव लाने के उद्देश्य से "रेडबस" की शुरुआत की।
प्रश्न 2: आपकी शुरुआती यात्रा कैसी रही?
उत्तर - इस विचार की शुरुआत तब हुई जब एक बार बस का टिकट न मिलने के कारण मुझे परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद मैंने महसूस किया कि बस सेवा को संगठित और डिजिटल बनाना जरूरी है। शुरुआती दिनों में सीमित फंड और अनुभव के कारण चुनौतियां थीं, लेकिन हम अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहे।
प्रश्न 3: आपने अपनी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए कौन-से कदम उठाए?
उत्तर - हमने तकनीक का इस्तेमाल करते हुए एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया जो यात्रियों और बस ऑपरेटरों को जोड़ सके। हमने ग्राहकों को सरलता, पारदर्शिता और सुविधा देने पर ध्यान केंद्रित किया। साथ ही, निवेशकों से समर्थन लेकर कारोबार को विस्तार दिया।
प्रश्न 4: इस सफर में सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?
उत्तर - शुरुआती दौर में लोगों को डिजिटल बुकिंग के फायदे समझाना और उन्हें इसे अपनाने के लिए प्रेरित करना सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन बेहतर सेवा और तकनीकी नवाचार से हमने यह बाधा पार की।
प्रश्न 5: नव उद्यमियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर - समस्याओं को पहचानें और उनका समाधान ढूंढें। असफलताओं को सीखने का अवसर मानें। धैर्य, नवाचार और निरंतर मेहनत से ही सफलता संभव है।

यह साक्षात्कार युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा और उद्यमिता के नए दृष्टिकोण दिए।

गुरुवार, 14 नवंबर 2024

जगन्नाथ शंकर सेठ: भारतीय रेल के अग्रदूत व जनक

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जगन्नाथ शंकर सेठ का नाम भारतीय इतिहास में एक ऐसे युगप्रवर्तक के रूप में दर्ज है जिन्होंने समाज सुधार और उद्योग के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए। उनका जन्म 10 फरवरी 1803 को महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में हुआ था, जहाँ बचपन से ही उन्होंने व्यापारिक कौशल और समाज सेवा के आदर्श सीखे। लेकिन उनका जीवन साधारण व्यापारिक गतिविधियों में सीमित नहीं रहा; उन्होंने अपने प्रयासों से समाज की जड़ता और अन्याय के विरुद्ध व्यापक जागरूकता फैलाई।

सेठ का जीवन संघर्ष और सेवा का अद्भुत संगम था। जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ उन्होंने निडर होकर आवाज उठाई। उनके साहस और निष्ठा ने उन्हें समाज में "समाज का दीपक" बना दिया, जो हर अंधकार को मिटाने के लिए प्रज्वलित रहा। व्यापार में आर्थिक सफलता प्राप्त करने के बाद भी उनका मुख्य ध्येय समाज की उन्नति ही रहा। सेठ की इसी सेवा भावना और दूरदृष्टि ने उन्हें अपने समय के समाज सुधारकों और बुद्धिजीवियों के बीच एक विशिष्ट स्थान दिलाया।

भारतीय रेल सेवा का स्वप्न भी उनके इसी दृष्टिकोण का हिस्सा था। ब्रिटिश शासनकाल में, रेल सेवा एक अनसुना और अव्यवहारिक विचार था, लेकिन सेठ ने इसे भारत में लाने की ठानी। 1843 में उन्होंने गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया को भारत में रेल नेटवर्क शुरू करने का प्रस्ताव दिया। शुरुआती अस्वीकार और उपेक्षा के बावजूद, सेठ ने धैर्य और तर्क के साथ सरकार को इसके लाभ समझाए। "लोहा काटे लोहे को" के दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने हर बाधा का सामना किया, और अंततः उनकी अडिग इच्छाशक्ति ब्रिटिश अधिकारियों को इसे स्वीकृति देने के लिए प्रेरित करने में सफल हुई। उनका विश्वास था कि रेल सेवा भारत के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़कर न केवल आर्थिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करेगी, बल्कि राष्ट्रीय एकता को भी सुदृढ़ करेगी।

रेल के क्षेत्र में उनके योगदान के अलावा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में भी सेठ का योगदान अभूतपूर्व था। 1822 में उन्होंने "बॉम्बे नेटिव एजुकेशन सोसाइटी" की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने आगे चलकर मुंबई विश्वविद्यालय का रूप लिया। सेठ का मानना था कि शिक्षा ही उन्नति का असली मार्ग है। उन्होंने अपनी संपत्ति का उपयोग करते हुए शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाने का प्रयास किया। उनका योगदान नारी सशक्तिकरण के प्रति भी उल्लेखनीय था, और उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई।

जगन्नाथ शंकर सेठ का जीवन उन सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है जो समाज और राष्ट्र के लिए कुछ करने का संकल्प रखते हैं। उनकी दूरदृष्टि, समर्पण और समाज सेवा के प्रति उनका अटूट विश्वास आज भी हमारे लिए मिसाल है। उन्होंने अपनी सफलता को केवल व्यक्तिगत नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज की बेहतरी के लिए समर्पित कर दिया। वह सच्चे अर्थों में "मन के मीत और कर्म के धनी" थे। भारतीय रेल की आधारशिला और सामाजिक सुधारों में उनका योगदान युगों तक स्मरणीय रहेगा।

बुधवार, 13 नवंबर 2024

उठती संस्कृति, गिरते मूल्य..!

शहरी आकर्षण में पलायन
        वर्तमान समय में शहरी संस्कृति बड़ी तेजी से विकसित हो रही है। बेहतर जीवन की लालसा में ग्रामीण शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बढ़ते शहरीकरण का प्रभाव हमारे समाज, संस्कृति, और संस्कारों पर भी परिलक्षित हो रहा है। विशेषकर, परिवारिक संरचना तेज़ी से बदल रही है। समाज में पहले जहाँ संयुक्त परिवारों की भूमिका महती थी, वहीं आज एकल परिवारों का वर्चस्व बढ़ा है। इस परिवेश में, सभी की स्थिति में बदलाव देखने को मिल रहा है। नतीजन, शहरों में भी लोग आज कहीं अधिक एकाकीपन, उपेक्षा और मानसिक तनाव के शिकार हैं।

शहरी संस्कृति में उभरते नव संस्कार -  
        संस्कार, किसी भी समाज की नींव होते हैं, जिनसे सामाजिक संतुलन और मानवता कायम रहती है। परंतु शहरी जीवन की आपाधापी और आधुनिकता की दौड़ में, पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों का ह्रास हो रहा है। बच्चों को संस्कारों और परंपराओं की शिक्षा देने के लिए जिस समय और ध्यान की आवश्यकता होती है, वो अक्सर व्यस्तता के कारण नहीं मिल पाता। माता-पिता कामकाजी होते हैं और बच्चों की परवरिश में अक्सर आधुनिक सुविधाओं और शिक्षा के प्रति अधिक ध्यान देते हैं, जबकि मूल्य और संस्कार अनदेखी का शिकार हो रहे हैं। डिजिटल दुनिया में बच्चों की व्यस्तता ने भी पारिवारिक समय और संस्कारों की शिक्षा को पीछे छोड़ दिया है।

        संयुक्त परिवारों में, बच्चों को दादा-दादी, नाना-नानी जैसे बुजुर्गों से संस्कारों का सजीव उदाहरण मिलता था। लेकिन एकल परिवारों में यह पहलू सीमित हो गया है। संयुक्त परिवारों की कमी से बच्चों का उनके बुजुर्गों के साथ संपर्क कम हो गया है, जो कि संस्कारों के अभाव का एक प्रमुख कारण है। शहरीकरण के साथ ही एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ा है। लोग अपने करियर और निजी जीवन में अधिक स्वतंत्रता चाहते हैं। आज का युवा वर्ग स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है और घर के कामों में बुजुर्गों की मदद की जगह खुद सब कुछ संभालना पसंद करता है। ऐसे में, वे खुद को अपने बुजुर्ग माता-पिता से अलग रहने में ही सुखद और सुविधाजनक महसूस करते हैं। एकल परिवार में बच्चों का पालन-पोषण तो होता है, परंतु वे दादा-दादी से मिले अनुभवों और समझदारी से वंचित रह जाते हैं।

        वहीं, एकल परिवारों में बच्चों की परवरिश करने वाले माता-पिता पर अत्यधिक दबाव भी होता है। अकेलेपन में बुजुर्गों का सहारा न होने के कारण, माता-पिता को बच्चों की देखभाल, करियर और घर की जिम्मेदारियों को अकेले संभालना पड़ता है। इन सबके बीच, वे स्वयं अपने बच्चों को पर्याप्त समय और संस्कार देने में असमर्थ हो जाते हैं। संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों का विशेष स्थान होता था। वे बच्चों के लिए सलाहकार और परिवार के लिए अनुभव का खज़ाना होते थे। परंतु एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने उनके जीवन में अलगाव और उपेक्षा की भावना भर दी है। अकेलेपन के कारण वे कई मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करने लगे हैं। समाज में वृद्धाश्रमों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जो एक संकेत है कि कई परिवार अपने बुजुर्गों की देखभाल करने में असमर्थ हैं या तैयार नहीं हैं।

        बुजुर्गों का स्वास्थ्य, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य, आज बड़ी चुनौती बन गया है। अकेलापन, उपेक्षा, और दूसरों पर निर्भरता की भावना उन्हें अवसाद और अन्य मानसिक समस्याओं की ओर ले जाती है। इसके साथ ही, बुजुर्गों के पास अधिक समय होता है, परंतु उनके साथ बिताने के लिए युवा पीढ़ी के पास समय की कमी होती है। यह असंतुलन बुजुर्गों को परिवार में अलग-थलग महसूस कराता है।

        शहरी जीवन की आपाधापी और व्यक्तिगत स्वार्थों को संतुलित कर के बुजुर्गों को फिर से सम्मान और सुरक्षा देने का प्रयास किया जा सकता है। सबसे पहले, यह ज़रूरी है कि परिवारों में बच्चों को संस्कारों और बुजुर्गों के प्रति आदर की भावना सिखाई जाए। माता-पिता को भी बच्चों के साथ बुजुर्गों का समय साझा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि बच्चे दादा-दादी या नाना-नानी से जीवन के अनुभवों और संस्कारों का लाभ उठा सकें।

        सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी बुजुर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयास करने चाहिए। वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ाने की बजाय, बुजुर्गों के लिए "Day care canters" जैसी योजनाएँ लागू की जा सकती हैं, जहाँ वे अपने जैसे लोगों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी समय बिता सकें और अपने साथियों के साथ कुछ वक्त बिताकर अकेलापन दूर कर सकें।

        अंततः, समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे और अपने बुजुर्गों के प्रति समर्पण की भावना रखे, तभी हम एक संतुलित और संस्कारी समाज की कल्पना कर सकते हैं। एक ऐसा समाज जहाँ बुजुर्ग अपने अनुभवों से समाज को संवार सकें, बच्चों को संस्कार मिल सकें और सभी मिलकर एक पारिवारिक संतुलन बना सकें।

        आग्रह है कि, इस लेख को पढ़ने के बाद यदि आपको कुछ पसंद / नापसंद आया तो हमें अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, इससे हमें अपने आपमें सुधार आ अवसर मिलता है। धन्यवाद।                        
        

विजय स्तंभ: चित्तौड़गढ़ की शान

पिछले सप्ताह मैंने राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहरों में से एक, चित्तौड़गढ़ का विजय स्तंभ देखने का निश्चय किया। इस यात्रा की योजना बनाते समय मेरे मन में एक अनोखा उत्साह था, मानो मैं भारतीय इतिहास की जड़ों से जुड़ने जा रहा हूँ। मैंने हमेशा से चित्तौड़गढ़ की कई रोचक कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन इस बार मैं खुद इस ऐतिहासिक स्थल पर जाकर उसकी भव्यता का अनुभव करना चाहता था।
जैसे ही मैंने चित्तौड़गढ़ किले में प्रवेश किया, मेरे मन में एक विशेष प्रकार की गर्व की भावना जाग उठी। यह किला भारत के गौरवशाली अतीत का प्रतीक है, और इसके विशाल द्वार से प्रवेश करते ही इतिहास जीवंत हो उठा। यहाँ के हर पत्थर, हर दीवार में शौर्य और बलिदान की कहानियाँ छिपी हुई हैं। लेकिन मेरा मन विजय स्तंभ को देखने के लिए व्यग्र था, जिसे महाराणा कुम्भा ने 1440 ईस्वी में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था।
जब मैंने पहली बार विजय स्तंभ को देखा, तो मैं उसकी ऊँचाई और स्थापत्य सौंदर्य से स्तब्ध रह गया। यह 37 मीटर ऊँचा स्तंभ दूर से ही अपनी भव्यता और उत्कृष्टता से मन मोह लेता है। 9 मंजिला इस स्तंभ की जटिल नक्काशियां और सुंदर मूर्तियां भारतीय शिल्पकारों की अद्वितीय कला का प्रतीक हैं। जैसे-जैसे मैं इसके पास पहुंचा, मेरे भीतर एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी, मानो मैं इतिहास के किसी स्वर्णिम अध्याय का हिस्सा बन गया हूँ।
विजय स्तंभ के अंदर प्रवेश करते ही मैंने उसके भीतर की सीढ़ियों की ओर देखा। मैं जैसे-जैसे ऊपर की ओर चढ़ता गया, हर मंजिल पर देवी-देवताओं की मूर्तियों और पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे हुए थे। इन नक्काशियों को देखते ही मन में यह सवाल उठने लगा कि कैसे हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक तकनीक के इतनी बारीकी और सटीकता से इस कृति का निर्माण किया होगा। हर मंजिल पर ठहरकर मैंने इन कलाकृतियों को निहारने का प्रयास किया, और हर बार उनमें कुछ नया, कुछ अनोखा दिखा।
जब मैं विजय स्तंभ की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुँचा, तो वहाँ से पूरे चित्तौड़गढ़ किले का विहंगम दृश्य देखने को मिला। हवा में हल्की ठंडक थी, और दूर-दूर तक फैला किला मेरे सामने था। उस पल, मुझे महसूस हुआ कि मैं सिर्फ एक पर्यटक नहीं हूँ, बल्कि इस किले के इतिहास का साक्षी भी हूँ। यह दृश्य मेरे मन में गहराई से बस गया, और मैं गर्व महसूस कर रहा था कि हमारे पूर्वजों ने अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए किस तरह से संघर्ष किया था।
यह यात्रा मेरे लिए सिर्फ एक पर्यटक स्थल की खोज नहीं थी, बल्कि यह मेरे इतिहास से जुड़ने का एक मौका था। मैंने विजय स्तंभ की भव्यता में भारतीय कला, संस्कृति और वीरता का अनूठा मिश्रण देखा। वहाँ खड़े होकर मुझे महसूस हुआ कि यह स्तंभ केवल पत्थरों से बनी संरचना नहीं है, बल्कि यह हमारे गौरवशाली अतीत का एक जीवंत प्रमाण है।
विजय स्तंभ से उतरते समय मेरे मन में संतोष था, और मैं सोच रहा था कि इस तरह की धरोहरें हमें न केवल अपने अतीत को समझने का अवसर देती हैं, बल्कि हमें भविष्य के लिए प्रेरित भी करती हैं।

सोमवार, 11 नवंबर 2024

साक्षात्कार: विजयश्री गुप्ता से प्रेरक मुलाकात

विजयश्री गुप्ता 
परिचय - मैं दीपाली, जो कि एक IBDP अध्ययनरत युवा छात्रा हूँ। मैंने 76 वर्षीया गोल्ला विजयश्री गुप्ता के बारे में काफी सुन रखा था। उनकी बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूँ। हाल ही में जब मैं एक खेल स्पर्धा में भाग लेने हैदराबाद गई तो सौभग्य से मेरी मुलाक़ात श्रीमती विजयश्री गुप्ता से हुई वह वहाँ मुख्य अतिथि बतौर आयी थीं। एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं, उन्होंने 76 साल की उम्र में भी अपने जुनून को बरकरार रखते हुए फिटनेस और स्विमिंग के क्षेत्र में अद्वितीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। 40 की उम्र में तैराकी सीखने से लेकर, 100 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पदक जीतने तक की उनकी यात्रा अत्यंत प्रेरक है। उनसे बातचीत का वर्णन साक्षात्कार स्वरूप निम्नलिखित है।

साक्षात्कार

दीपाली: नमस्ते विजयश्री जी, मुझे बहुत खुशी है कि आज मैं आपके साथ बात कर रही हूँ। आपने अपनी उम्र के बावजूद इतनी ऊर्जा और फिटनेस को बनाए रखा है। क्या आप मुझे बता सकती हैं कि आपकी इस यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?

विजयश्री का सतत अभ्यास  
विजयश्री गुप्ता: नमस्ते दीपाली! मेरी यह यात्रा काफी रोचक रही है। मैंने 40 की उम्र में स्विमिंग सीखना शुरू किया। उस समय मैं अपनी सबसे छोटी बेटी के साथ समय बिताने के लिए तैरना सीख रही थी। हालांकि, यह शौक धीरे-धीरे मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

दीपाली: 40 की उम्र में स्विमिंग सीखने का फैसला कैसे लिया? आमतौर पर लोग इस उम्र में कुछ नया सीखने के बारे में नहीं सोचते।

विजयश्री गुप्ता: सही कहा आपने, अक्सर जिम्मेदारियों के चलते महिलाएँ स्वयं को भूल जाती हैं। मद्रास यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद मेरी शादी  हो गई थी, और तीन बच्चों की देखभाल में व्यस्त हो गई। 1999 में, मैंने सोचा कि अब मुझे अपने लिए भी कुछ करना चाहिए। तभी मैंने स्विमिंग सीखना शुरू किया, शुरुआत में यह टाइम पास जैसा लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह मेरा पैशन बन गया।

दीपाली: यह प्रेरणादायक है! फिर आपने स्विमिंग को प्रोफ़ेशनल स्तर पर ले जाने का फैसला कब किया?

विजयश्री गुप्ता: जब मेरा शौक बढ़ता गया तो मेरे परिवार ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने 45-50 आयु वर्ग में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया। 2007 में न्यू जर्सी सीनियर ओलंपिक चैम्पियनशिप में तीन स्वर्ण पदक जीतने के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया, और मैंने अपनी फिटनेस और तकनीक पर और अधिक मेहनत की।

दीपाली: वाह, इतने सारे पदक जीतना एक बड़ी उपलब्धि है। आपको अब तक के अपने अनुभवों में सबसे यादगार पल कौन सा लगता है?

विजयश्री गुप्ता: हर पदक की अपनी कहानी है, पर न्यू जर्सी में तीन स्वर्ण पदक जीतना मेरे लिए खास था। वहां मुझे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मिली। इसके बाद तो मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब तक 100 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पदक जीत चुकी हूं।

दीपाली: यह जानकर बहुत अच्छा लगा। आप न केवल एक तैराक हैं बल्कि एक उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। क्या आप अपने अन्य कार्यों के बारे में भी कुछ बताएंगी?

विजयश्री गुप्ता: हाँ , मैं रेडियो पर भी कई कार्यक्रमों की मेजबानी कर चुकी हूँ। विजयवाड़ा में ऑल इंडिया रेडियो पर ‘युवा वाणी’ और ‘वनिता वाणी’ जैसे कार्यक्रमों का संचालन किया, जो मेरे लिए बेहद संतोषजनक अनुभव रहा। इसके अलावा, सामाजिक कार्यों में मेरी गहरी रुचि है। 

दीपाली: आपकी बातों से लगता है कि आपके लिए उम्र सिर्फ एक संख्या है। इस उम्र में भी आप इतनी सक्रिय कैसे रहती हैं?

विजयश्री गुप्ता: मैं 76 साल की हूँ और अभी भी हर दिन कम से कम एक किलोमीटर तैरती हूँ। यह सब मेरे नियमित अभ्यास और सकारात्मक सोच का परिणाम है। मेरा मानना ​​है कि हमें उम्र की परवाह किए बिना अपने मुश्किल लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रयास करना चाहिए। मैं अभी भी उसी उत्साह के साथ प्रतियोगिताओं में जाती हूँ और लगातार अभ्यास की वजह से स्वस्थ और युवा दिखती हूँ। मेरा मानना है कि, महिलाएँ यदि ठान लें तो कुछ भी कर सकती हैं। उम्र कभी बाधा नहीं बनती, बल्कि इसे सिर्फ मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।

दीपाली: अंत में, युवा महिलाओं के लिए आपका क्या संदेश है?

विजयश्री गुप्ता:  मैं सभी महिलाओं को यही संदेश देना चाहूंगी कि वे अपनी उम्र और जिम्मेदारियों को अपने सपनों के आड़े न आने दें। खुद पर भरोसा रखें, खुद को समय दें, और अपने सपनों को पूरा करने के लिए पूरी लगन से प्रयास करें। आप किसी भी उम्र में कुछ भी हासिल कर सकती हैं। साथ ही मैं उनके अभिभावकों को भी कहना चाहूंगी कि 'वे अपनी बेटियों को पारंपरिक भूमिकाओं तक सीमित न रखें, बल्कि उनकी रुचियों का समर्थन करें।' 

दीपाली: विजयश्री जी, आपके विचार और आपकी यात्रा सच में प्रेरणादायक है।

उदाहरण 2 
हाल ही में आपके विद्यालय में प्रसिद्ध उद्योगपति 'पीटर जैक्सन' अतिथि स्वरूप आए थे। वहां आपकी मुलाकात उनसे हुई। आपसे हुई उनकी बातचीत को साक्षात्कार के रूप में (IBDP हेतु) 450 शब्दों में लिखिए। 
आदर्श उत्तर 
प्रश्न 1: सर, कृपया हमें अपने बारे में बताएं।  
उत्तर: मैं पीटर जैक्सन हूं, "इनोवेटिव टेक सॉल्यूशंस" का संस्थापक और सीईओ। मैंने एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लिया। बचपन से ही मैं तकनीकी नवाचारों और समस्याओं को हल करने के तरीकों में रुचि रखता था। मेरा मानना है कि हर समस्या अपने साथ एक नया समाधान लेकर आती है।  
प्रश्न 2: आपने अपने करियर की शुरुआत कैसे की?  
उत्तर: शुरुआत में मैंने अपने गैरेज में एक छोटा प्रोजेक्ट शुरू किया। मुझे तकनीकी उपकरणों की कमी और वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन मैंने हर दिन अपने काम में कुछ नया जोड़ने की कोशिश की। मेरी पहली बड़ी सफलता तब मिली जब मैंने एक सॉफ़्टवेयर डेवेलप किया जिसने छोटे व्यवसायों के लिए बड़े बदलाव किए।  

प्रश्न 3: अपने व्यवसाय को सफल बनाने के लिए आपने कौन-से कदम उठाए?
उत्तर: मैंने सबसे पहले अपने ग्राहकों की जरूरतों को समझा और उनके अनुसार समाधान तैयार किए। इसके अलावा, मैंने एक मजबूत टीम का निर्माण किया, जहां हर व्यक्ति की प्रतिभा का उपयोग हो। हमने तकनीकी अनुसंधान और उत्पाद की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया। ग्राहकों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखकर लगातार सुधार करना हमारी सफलता का बड़ा कारण बना।  

प्रश्न 4: शुरुआती संघर्षों का सामना करते समय आपकी सबसे बड़ी प्रेरणा क्या थी? 
उत्तर: मेरी प्रेरणा मेरे माता-पिता थे। उन्होंने मुझे सिखाया कि कठिनाइयों से भागना समाधान नहीं है। उनका यह कहना कि "असफलता केवल एक सीढ़ी है, सफलता तक पहुंचने की," मेरे जीवन का मूल मंत्र बन गया।  
प्रश्न 5: आपके जीवन का सबसे कठिन निर्णय कौन-सा था?
उत्तर: मेरे जीवन का सबसे कठिन निर्णय था जब मुझे अपनी नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू करना पड़ा। यह बहुत जोखिम भरा था, लेकिन मैंने अपने सपनों पर भरोसा किया। यदि मैं यह कदम नहीं उठाता, तो शायद आज इस मुकाम पर नहीं होता।  
प्रश्न 6: नव उद्योगपतियों के लिए आपका क्या संदेश है? 
उत्तर: असफलताओं से डरें नहीं। धैर्य और लगन के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। हर असफलता को सीखने का एक मौका मानें और अपने आसपास की समस्याओं को समाधान में बदलने की कोशिश करें।  
प्रश्न 7: आपकी सफलता का मूल मंत्र क्या है?  
उत्तर: मेरा मंत्र है— "मेहनत, ईमानदारी और कभी न रुकने वाला सीखने का जुनून।" इसके साथ-साथ, टीम के साथ सही तालमेल और ग्राहकों का विश्वास भी सफलता के अहम स्तंभ हैं।  
प्रश्न 8: आप भविष्य में क्या लक्ष्य लेकर चल रहे हैं?
उत्तर: मेरा उद्देश्य है तकनीक के माध्यम से समाज को सशक्त बनाना। मैं चाहता हूं कि हमारी कंपनी ऐसी परियोजनाओं पर काम करे जो पर्यावरण को बेहतर बनाए और दुनिया के हर कोने में तकनीकी सुविधा पहुंचे।  
निष्कर्ष:
इस साक्षात्कार से हमने सीखा कि "असफलताओं और कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कैसे आगे बढ़ा जा सकता है।" पीटर जैक्सन का जीवन प्रेरणा देता है कि यदि मेहनत और ईमानदारी से काम किया जाए, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।

छात्रों के  निर्देश - 

प्रिय छात्रों, यदि आप भी इस प्रकार के प्रभावी साक्षात्कार लेखन करना चाहते हैं तो आपकी सहायता के लिए नीचे कुछ प्रश्न दिए जा रहे हैं, जिनके आधार पर उत्तर लिखकर आप अपनी कल्पनाशीलता और लेखन क्षमता का विकास करा सकते हैं। साक्षात्कार अभ्यास के लिए आप सभी को प्रोत्साहित करने हेतु निम्नलिखित प्रश्न सुझाए जा रहे हैं - 

  1. आपने यह क्षेत्र क्यों चुना, और आपकी प्रेरणा क्या रही?
  2. आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, और उसे हासिल करने के लिए आपने क्या प्रयास किए?
  3. आपने अपने करियर में सबसे बड़ी चुनौती का सामना कब किया, और उसे कैसे पार किया?
  4. अगर आपको पीछे मुड़कर देखने का मौका मिले, तो क्या कोई ऐसा निर्णय है जिसे आप बदलना चाहेंगे?
  5. सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण क्या हैं, जो हर किसी में होने चाहिए?\
  6. आपकी दिनचर्या कैसी होती है, और कैसे आप अपने काम और जीवन में संतुलन बनाए रखते हैं?
  7. इस क्षेत्र में आने वाले युवाओं को आप क्या सुझाव देंगे?
  8. आपकी नज़र में, असफलता से कैसे निपटना चाहिए?
  9. आपके अनुसार, समाज में बदलाव लाने के लिए युवा पीढ़ी की क्या भूमिका होनी चाहिए?
  10. आपके जीवन का कोई ऐसा अनुभव साझा करें जिसने आपको गहराई से प्रभावित किया हो।
  11. आपकी सफलता में परिवार और दोस्तों का क्या योगदान रहा?
  12. आपको कौन सी किताब या व्यक्ति सबसे ज्यादा प्रेरित करता है?
  13. आपने समय प्रबंधन कैसे सीखा, और इसके क्या फायदे होते हैं?
  14. भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं, और आप इन्हें कैसे पूरा करेंगे?
  15. आपकी सबसे पसंदीदा आदत क्या है, जो आपको हर दिन प्रेरित करती है?
इन प्रश्नों के माध्यम से आपको किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व, अनुभव और विचारों को समझने का मौका मिलेगा, जिससे आप साक्षात्कार में गहराई से संवाद करना सीख सकेंगे। शुभकामना।

ध्यानार्थ - उपरोक्त साक्षात्कार पूर्णतः काल्पनिक है, जिसका उद्देश्य  विद्यार्थी व शिक्षकों हेतु सहायक सामग्री तक सीमित है। कुछ सूचनाएँ और तथ्य पाठ को रोचक बनाने के लिए ऑनलाइन मंचों से लिए गए हैं  इनका  किसी घटना, व्यक्ति अथवा स्थान से संबंध केवल संयोग मात्र है।

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