शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

नागालैंड में चलती हैं, विश्वास की दुकानें (वाचन प्रयोगशाला)

IndiCoach IGCSE Reading Lab

नागालैंड में चलती हैं ‘विश्वास की दुकानें’

सुनिए, पढ़िए, उत्तर दीजिए और अपने उत्तर की पुष्टि मूल पाठ के प्रमाण से कीजिए।

IGCSE Hindi 0549AO1 ReadingR1–R4अभ्यास 1 · 9 अंकअभ्यास 3 · 7 अंक
IndiCoach IGCSE Reading Lab — नागालैंड की ईमानदारी की दुकान
IndiCoach IGCSE Reading Labवाचन · समझ · प्रमाण

आइए वाचन अभ्यास करें

आलेख को स्वयं पढ़ें या हिंदी वाचन के साथ सुनते हुए पढ़ें।

🎧 हिंदी वाचन साथी
उपलब्ध होने पर ब्राउज़र की हिंदी आवाज़ को प्राथमिकता दी जाएगी।
वाचन के लिए तैयार।

आज हमारे दैनिक जीवन में सुरक्षा और निगरानी सामान्य बात हो गई है। दुकानों में कैमरे लगे होते हैं, कार्यालयों में पहचान-पत्र जाँचे जाते हैं और ऑनलाइन भुगतान में बार-बार पहचान की पुष्टि करनी पड़ती है। इन व्यवस्थाओं के अपने कारण हैं, फिर भी एक प्रश्न उठता है—क्या समाज केवल निगरानी से सुरक्षित बनता है, या लोगों के बीच आपसी विश्वास भी उतना ही आवश्यक है? इस प्रश्न का रोचक उत्तर नागालैंड के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में दिखाई देता है। फेक जिले के फुत्सेरो में सड़क किनारे ऐसी छोटी दुकानें मिलती हैं, जिन्हें ‘ऑनेस्टी शॉप’ अर्थात ईमानदारी की दुकान कहा जाता है। स्थानीय किसान इनमें अपने खेतों की सब्जियाँ और फल रखते हैं। प्रत्येक वस्तु की कीमत लिखी होती है और भुगतान के लिए एक डिब्बा रखा रहता है। न कोई दुकानदार दिनभर वहाँ बैठता है और न ग्राहक पर निगरानी रखता है।

ऐसी ही एक दुकान चलाने वाली वेनेलु सुबह टमाटर, पत्तागोभी, अदरक और संतरे सजाकर अपने खेत चली जाती थी। इससे उसे दुकान और खेती में से किसी एक को चुनना नहीं पड़ता था और ग्राहक भी अपनी सुविधा से सामान खरीद सकते थे। एक दोपहर चौदह वर्षीय केविसेतुओ वहाँ पहुँचा। माँ ने उसे अदरक और दो पत्तागोभी लाने भेजा था। सामान उठाने के बाद उसने पैसे गिने तो वे कीमत से बीस रुपये कम थे। आसपास कोई नहीं था। वह कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, फिर एक पत्तागोभी वापस रख दी। उसने लिए गए सामान के पूरे पैसे डिब्बे में डाले और पास पड़े कागज पर लिखा—“बाकी सामान कल ले जाऊँगा।”

अगली सुबह उसी कागज के नीचे एक नई पंक्ति थी—“जरूरत हो तो ले जाओ, पैसे बाद में दे देना।” केविसेतुओ ने उसे पढ़ा, लेकिन सामान नहीं लिया। शाम को वह माँ के साथ लौटा, बाकी पत्तागोभी खरीदी और डिब्बे में बीस रुपये अतिरिक्त डाल दिए। वेनेलु ने उस शाम पैसे गिने तो अतिरिक्त राशि देखकर मुस्करा दी। उसने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि पैसे किसने रखे थे। अगले दिन उसने हमेशा की तरह दुकान सजाई और खेत चली गई। इन दुकानों से किसानों का समय बचता है और स्थानीय उपज सीधे ग्राहकों तक पहुँचती है। लेकिन इनकी सफलता केवल खरीद-बिक्री की सरल व्यवस्था में नहीं छिपी है। दुकानदार ग्राहक पर भरोसा करता है और ग्राहक उस भरोसे की जिम्मेदारी स्वीकार करता है।

हर स्थान पर बिना दुकानदार की दुकान खोल देना शायद संभव न हो, लेकिन नागालैंड का यह छोटा-सा प्रयोग एक बड़ी सीख देता है। नियम और निगरानी आवश्यक हो सकते हैं, पर विश्वास केवल कैमरे लगाकर पैदा नहीं किया जा सकता। वह तब बढ़ता है, जब किसी व्यक्ति को सही काम करने का अवसर मिले और वह बिना किसी डर के स्वयं सही रास्ता चुने। इसलिए इन दुकानों का महत्त्व केवल फल-सब्जियाँ बेचने तक सीमित नहीं है; वे यह दिखाती हैं कि समाज में विश्वास माँगने से पहले विश्वास करने का साहस भी आवश्यक है। शायद किसी समाज की सबसे मजबूत सुरक्षा वह विश्वास है, जिसकी रक्षा लोग स्वयं करते हैं।

↕ आलेख के शेष भाग को इसी खंड में स्क्रोल करके पढ़ें।
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अभ्यास यहीं समाप्त नहीं होता।

इस Reading Lab की डाउनलोड करने योग्य अभ्यास-वर्कशीट IndiCoach Premium पर उपलब्ध है। इसे कक्षा-अभ्यास, गृहकार्य अथवा पुनरावृत्ति के लिए उपयोग कीजिए। इसी तरह के अन्य Cambridge IGCSE Hindi अभ्यासों के लिए IndiCoach के साथ बने रहिए।

आत्मविश्वास के साथ पढ़ें, समझें और प्रमाण के साथ उत्तर लिखें — यही है IndiCoach का वचन।

कैफ़े सात्विक : वाचन की प्रयोगशाला

INDICOACH • IGCSE HINDI 0549 • READING + WRITING LAB
Reading Lab

सस्वर वाचन, वाचन की शुद्धता, पठन-बोध और लेखन अभ्यास भी... अब तीनों को एक ही अध्ययन यात्रा में अभ्यास कीजिए।

🎙️ वाचन अभ्यास📖 अभ्यास 1 • 9 अंक ✍️ अभ्यास 5 • 15 अंक📱 Mobile-first

आज की अध्ययन यात्रा

पहले आलेख को सस्वर पढ़िए। आपकी ध्वनि का लिखित रूपांतरण नीचे दिखाई देगा। फिर पठन-बोध के 9 अंकों के आलेख से संबंधित अभ्यास प्रश्न और अंत में अभ्यास 4 हेतु लेखन का अभ्यास कर सकेंगे।

ध्यान दें: ब्राउज़र की वाक्-पहचान कभी-कभी सही बोले गए शब्द को भी अलग पहचान सकती है। इसलिए “गलत” के बजाय यहाँ “मूल पाठ से मेल नहीं” माना गया है।

🎙️ चरण 1 — सस्वर वाचन चुनौती

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‘कैफ़े सात्विक’ - जहाँ भोजन के साथ घर का स्वाद भी परोसा जाता है।

महानगरों में रेस्तरां की कमी नहीं है। कहीं विदेशी व्यंजनों का आकर्षण है, तो कहीं नए स्वाद और आकर्षक सजावट ग्राहकों को बुलाती है। इसी भीड़ के बीच हेमंत कुमार और उनकी पत्नी रीमा ने तीन वर्ष पहले ‘सात्विक’ नाम से एक छोटा-सा रेस्तरां शुरू किया। उनका उद्देश्य केवल भोजन बेचना नहीं था। वे लोगों को उस घरेलू भोजन से फिर जोड़ना चाहते थे, जो व्यस्त जीवन में धीरे-धीरे हमारी थाली से दूर होता जा रहा है।

इस विचार की शुरुआत उनके अपने घर से हुई। हेमंत नौकरी के कारण कई वर्षों तक अलग-अलग शहरों में रहे। बाहर का स्वादिष्ट भोजन आसानी से मिल जाता था, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें माँ के हाथ की साधारण दाल, मौसमी सब्ज़ी और ताज़ी रोटी की याद आने लगती। दूसरी ओर, रीमा ने देखा कि उनके आसपास रहने वाले अनेक विद्यार्थी और कामकाजी युवा समय की कमी के कारण अक्सर तैयार या बाहर के भोजन पर निर्भर रहते थे। दोनों ने सोचा कि क्यों न ऐसा स्थान बनाया जाए जहाँ भोजन रेस्तरां में मिले, लेकिन उसका आधार घरेलू रसोई हो।

‘सात्विक’ की रसोई में इसलिए बहुत लंबी भोजन-सूची नहीं रखी गई है। यहाँ व्यंजन मौसम और उपलब्ध सामग्री के अनुसार बदलते रहते हैं। गर्मियों में लौकी, तोरई, ककड़ी और छाछ जैसे हल्के विकल्प अधिक दिखाई देते हैं, जबकि सर्दियों में बाजरे की रोटी, हरी सब्ज़ियाँ और तिल से बने व्यंजनों को स्थान मिलता है। रीमा का मानना है कि घरेलू भोजन की विशेषता केवल उसके स्वाद में नहीं, बल्कि स्थानीय और मौसमी सामग्री के समझदारी से उपयोग में भी है।

रेस्तरां की एक और विशेषता है—‘दादी-नानी की थाली’। हर महीने ग्राहकों से उनके परिवार के किसी पारंपरिक व्यंजन की विधि माँगी जाती है। चुनी गई विधि को आवश्यक सुधार के बाद कुछ दिनों के लिए भोजन-सूची में शामिल किया जाता है। कभी राजस्थान की बाजरे की खिचड़ी आती है, तो कभी बिहार का सत्तू पराठा या महाराष्ट्र की पिठला-भाकरी। इससे कई ऐसे व्यंजन नई पीढ़ी तक पहुँच रहे हैं जो परिवारों की रसोई तक सीमित होते जा रहे थे।

हेमंत के अनुसार घरेलू भोजन को केवल स्वास्थ्य से जोड़ना भी उचित नहीं है। भोजन हमारी स्मृतियों और संबंधों का हिस्सा है। किसी विशेष पकवान की खुशबू हमें बचपन, त्योहार या परिवार के किसी सदस्य की याद दिला सकती है। शायद इसी कारण ‘सात्विक’ में आने वाले कुछ ग्राहक कहते हैं कि यहाँ उन्हें केवल पेट भरने का भोजन नहीं, बल्कि घर से जुड़ने का अनुभव मिलता है।

फिर भी हेमंत और रीमा परंपरा को ज्यों-का-त्यों बनाए रखने के पक्ष में नहीं हैं। वे कम तेल, संतुलित मात्रा और आज की जीवन-शैली के अनुसार कुछ बदलाव करते हैं। उनका विश्वास है कि परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह नए समय के साथ संवाद करती रहे।

‘सात्विक’ की कहानी बताती है कि आधुनिक जीवन में घरेलू भोजन का अर्थ केवल घर में बना खाना नहीं है। यह स्थानीय सामग्री, पारिवारिक स्मृतियों और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान को सँभालने का एक माध्यम भी हो सकता है। तेज़ी से बदलती भोजन-संस्कृति के बीच शायद हमारी साधारण-सी थाली में ही ऐसी बहुत-सी बातें छिपी हैं जिन्हें बचाए रखना आवश्यक है।

आपने जो पढ़ा — Live Transcript

वाचन शुरू करने पर आपकी आवाज़ का लिखित रूप यहाँ दिखाई देगा…।
आपके ब्राउज़र में Hindi Speech Recognition उपलब्ध नहीं दिख रही। आलेख और बाकी अभ्यास फिर भी काम करेंगे। Chrome/Edge में microphone अनुमति देकर पुनः प्रयास किया जा सकता है।

📊 चरण 2 — Reading Accuracy Report

समय—
अनुमानित शुद्धता—
मेल खाते शब्द—
पुनः अभ्यास—
कैसे पढ़ें: लाल लहरदार रेखा = मूल पाठ से मेल नहीं; काटा हुआ लाल = संभावित छूटा शब्द; बैंगनी बिंदीदार = अतिरिक्त/अलग शब्द।

तुलना

🎯 मेरे कठिन शब्द

रिपोर्ट बनने पर शब्द यहाँ आएँगे।

📝 चरण 3 — अभ्यास 1: वाचन-बोध

कुल 9 अंक: 5 × 1 अंक + 2 × 2 अंक। उत्तर संक्षिप्त बिंदु/वाक्यांश में दीजिए।

आलेख दोबारा देखें
1. हेमंत को दूसरे शहरों में रहते हुए किस भोजन की याद आती थी?[1]
✓ माँ के हाथ की साधारण दाल / मौसमी सब्ज़ी / ताज़ी रोटी
2. अनेक विद्यार्थी और कामकाजी युवा बाहर के भोजन पर क्यों निर्भर रहते थे?[1]
✓ समय की कमी
3. ‘सात्विक’ में व्यंजन किन बातों के अनुसार बदलते हैं?[1]
✓ मौसम और उपलब्ध सामग्री
4. ‘दादी-नानी की थाली’ के लिए व्यंजनों की विधियाँ कहाँ से प्राप्त की जाती हैं?[1]
✓ ग्राहकों / उनके परिवारों से
5. कुछ ग्राहकों को ‘सात्विक’ में भोजन करने पर कैसा अनुभव होता है?[1]
✓ घर से जुड़ने का अनुभव
6. ‘दादी-नानी की थाली’ से पारंपरिक व्यंजनों को कौन-से दो लाभ हो रहे हैं?[2]
✓ नई पीढ़ी तक पहुँच
✓ लुप्त/सीमित होते पारंपरिक व्यंजनों का संरक्षण
7. हेमंत और रीमा पारंपरिक भोजन को आधुनिक जीवन के अनुकूल बनाने के लिए कौन-से दो बदलाव करते हैं?[2]
✓ कम तेल का प्रयोग
✓ संतुलित मात्रा

🌉 आपने पढ़ा और समझा। अब अपनी बात लिखिए।

‘सात्विक’ ने घरेलू भोजन को स्वास्थ्य, स्मृति, संस्कृति और बदलती जीवन-शैली से जोड़ा। अब इन्हीं विचारों को दोहराने के बजाय अपना दृष्टिकोण विकसित कीजिए।

✍️ चरण 4 - अभ्यास 5: Writing Studio

आज के युवाओं के लिए घरेलू भोजन का महत्त्व

आपके विद्यालय की छात्र-पत्रिका में इस विषय पर विशेषांक प्रकाशित किया जा रहा है। 120–160 शब्दों में एक लेख लिखिए।

अपने लेख में शामिल करें:
• युवा बाहर के भोजन की ओर अधिक आकर्षित क्यों होते हैं?
• घरेलू और पारंपरिक भोजन का महत्त्व क्या है?
• युवाओं को ऐसे भोजन से दोबारा जोड़ने के लिए क्या किया जा सकता है? • आपका अपना कोई घरेलू भोजन क्या हो सकता है?
शब्द: 0 / 120–160

W1–W4 Self-Review

W1
W2
W3
W4

Model Response — सीखने के लिए

W4 आज की तेज़ जीवन-शैली में युवाओं के लिए बाहर का भोजन सुविधाजनक और आकर्षक लगता है। नए स्वाद, विज्ञापन और समय की कमी भी उन्हें इसकी ओर खींचते हैं। फिर भी घरेलू भोजन का महत्त्व केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है।

W1 घर का भोजन स्थानीय और मौसमी सामग्री से जुड़ा होता है तथा परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाता है। किसी परिचित व्यंजन का स्वाद हमें अपने परिवार और संस्कृति की याद भी दिला सकता है। W2 इसलिए नई पीढ़ी को पारंपरिक भोजन से जोड़ने के लिए केवल उपदेश देना पर्याप्त नहीं है।

W2 यदि में अपने घर के किसी पारंपरिक एवं स्थानीय भोजन की बात करूँ तो वह दाल-पकवान हो सकता है। यह हम पारसी समुदाय का घरेलू और विशेष अवसरों पर बनाया जाना वाला खाद्य पदार्थ है।

W3 विद्यालयों में पारंपरिक व्यंजन दिवस आयोजित किए जा सकते हैं, परिवार बच्चों को कोई पुरानी विधि बनाना सिखा सकते हैं और रेस्तरां घरेलू व्यंजनों को आधुनिक ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रकार सुविधा और परंपरा के बीच संतुलन बनाकर घरेलू भोजन को नई पीढ़ी के लिए फिर प्रासंगिक बनाया जा सकता है।

🏁 SATVIK — My Learning Report

Reading Time—
Reading Accuracy—
अभ्यास 19 अंक
Writing0 शब्द
R1
स्पष्ट जानकारी
R2
विचारों का संबंध
R3
विवरण पहचानना
R4
निहित अर्थ
याद रखें: प्रभावी पठन केवल तेज़ पढ़ना नहीं है। लक्ष्य है—गति + शुद्धता + समझ।

यात्रा वृत्तांत: बनारस से लमही तक (Premchand)

बनारस से लमही तक — प्रेमचंद की मिट्टी की ओर — यात्रा वृत्तान्त
🎧
श्रवण कौशल सुनकर समझिए
📖
पठन कौशल पढ़कर समझिए
✍️
लेखन कौशल लिखकर व्यक्त कीजिए
गति 1.00×

यात्रा-वृत्तान्त पढ़िए और सुनिए

श्रवण + पठन

मुंबई से बनारस की यात्रा मेरे लिए केवल एक शहर से दूसरे शहर तक पहुँचने की यात्रा नहीं थी। इस बार बनारस के आगे एक और यात्रा मेरा इंतज़ार कर रही थी—लमही की, उस मिट्टी की, जहाँ हिंदी के कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने जन्म लिया था। अवसर भी असाधारण था। प्रेमचंद की जन्म-जयंती पर लमही में राजकीय सम्मान के साथ आयोजित समारोह में देश के अनेक साहित्यकारों, लेखकों और हिंदी-सेवियों के साथ सम्मिलित होने का निमंत्रण मिला था।

मुंबई की भागती हुई रात से निकलकर बनारस की सुबह में पहुँचना अपने आप में जैसे समय की दो अलग-अलग धाराओं से गुजरना था। मुंबई में रात भी जागती रहती है; बनारस में सुबह जैसे धीरे-धीरे आँखें खोलती है। यहाँ दिन उगता नहीं, बनता है।

सुबह-सुबह घाटों की ओर निकला तो बनारस अपने पूरे ठाठ में सामने था। गंगा के ऊपर हलकी धुंध की चादर थी। नावें पानी को चीरती हुई आगे बढ़ रही थीं। घाट की सीढ़ियों पर कोई सूर्य को अर्घ्य दे रहा था, कोई मंत्रोच्चार में डूबा था, कोई चुपचाप गंगा को निहार रहा था। कहीं घंटियों की टुनक थी, कहीं शंख की ध्वनि; और इनके बीच चाय की दुकान से उठती आवाज—“बाबू, चाय ले लऽ।”

बनारस में शायद यही सबसे अद्भुत बात है—यहाँ आध्यात्म और रोजमर्रा का जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं चलते।

एक ओर आरती की तैयारी थी, दूसरी ओर कुल्हड़ में चाय छलक रही थी। कहीं कोई साधु धूनी रमाए बैठा था, तो थोड़ी दूर कोई रिक्शेवाला अपने दिन की पहली सवारी की बाट जोह रहा था। फूल बेचने वाला, नाविक, पुजारी, विद्यार्थी, पर्यटक, भिखारी, दुकानदार—सब अपने-अपने छोटे संसार लेकर उसी घाट पर उपस्थित थे।

गंगा सबको देख रही थी।

बनारस को समझना हो तो शायद उसकी गलियों में खो जाना चाहिए। संकरी गलियाँ, जिनमें दो लोग आमने-सामने से निकलें तो कंधे बचाने पड़ें; ऊपर झुकी पुरानी बालकनियाँ; दीवारों पर चिपके पोस्टर; कहीं अगरबत्ती की गंध, कहीं ताज़े पकौड़ों की महक; और हर मोड़ पर कोई नया दृश्य।

यहाँ रास्ते सीधे नहीं होते, पर जीवन सीधा दिखाई देता है।

एक गली से निकलो तो मंदिर। दूसरी से निकलो तो पान की दुकान। तीसरी में साड़ी की दुकान। चौथी में कोई बूढ़ा चौखट पर बैठा दुनिया का हाल सुना रहा है। बनारस अपने आपको देखने के लिए आपको कभी रोकता नहीं; वह बस चलता रहता है और आप उसके पीछे-पीछे चलते हुए उसके अर्थ पकड़ते रहते हैं।

पान की दुकानों पर बनारसी ठसक थी और बातचीत में वह मिठास, जिसमें तंज भी अपनापन लगता है। कोई कह रहा था—“का गुरु, पहली बार आए हउवा?” और अगले ही क्षण ऐसा व्यवहार कि जैसे बरसों की पहचान हो।

बनारस की भाषा भी उसकी गलियों जैसी है—घुमावदार, चुटीली और जीवन से भरी हुई।

दोपहर तक शहर कुछ और रूप धर चुका था। गलियों में चहल-पहल बढ़ गई थी। दुकानों के पट खुल चुके थे। मंदिरों की घंटियाँ अब भी सुनाई दे रही थीं। घाटों पर पर्यटकों की भीड़ थी। नाविक अपनी नावों को आवाज दे रहे थे। ऊपर आसमान में धूप चढ़ आई थी, लेकिन गंगा के किनारे बैठते ही जैसे मन का ताप उतरने लगा।

मैं सोच रहा था—प्रेमचंद का बनारस कैसा रहा होगा?

जिस शहर ने सदियों से साधु और शिल्पी, पंडित और पथिक, राजा और रंक—सबको अपने भीतर जगह दी, उसी सांस्कृतिक भूगोल के पास एक ऐसा गाँव भी था, जहाँ से एक बालक आगे चलकर भारतीय समाज की कथा लिखने वाला था।

लमही अभी कुछ दूर था। लेकिन अब उसकी ओर जाने की इच्छा पहले से अधिक तीव्र हो गई थी।

हम दोपहर बाद बनारस से लमही की ओर निकले। शहर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा। भीड़ कम हुई। सड़क कुछ खुली। पक्के मकानों की जगह खेत दिखाई देने लगे। बीच-बीच में पेड़ों की कतारें थीं। सड़क किनारे बैठे किसान, साइकिल से स्कूल जाते बच्चे, छोटी दुकानों पर जमा लोग—बनारस का शहरी शोर पीछे रह गया था और गाँव की अपनी लय सुनाई देने लगी थी।

मेरे साथ गाड़ी में कई साहित्यकार थे। प्रेमचंद की चर्चा फिर शुरू हो गई। कोई ‘गोदान’ की बात कर रहा था, कोई ‘कफन’ की। मैं खिड़की से बाहर देख रहा था।

अचानक लगा, जिन पात्रों को हम किताबों में पढ़ते हैं, वे इन्हीं रास्तों से होकर हमारे पास आए होंगे।

होरी शायद किसी खेत की मेड़ पर खड़ा था।

धनिया किसी आँगन में अपनी गृहस्थी सँभाल रही थी।

हामिद किसी मेले की ओर भाग रहा था।

और प्रेमचंद—वे शायद इन्हीं चेहरों को पढ़ रहे थे।

लमही की ओर बढ़ते हुए मेरे मन में यह बात साफ होती गई कि प्रेमचंद ने गाँव को केवल देखा नहीं था। उन्होंने गाँव को भीतर तक जिया था। इसीलिए उनकी रचनाओं में गाँव केवल पृष्ठभूमि नहीं बनता; वह स्वयं एक पात्र बन जाता है।

कुछ ही देर में लमही आ गया।

मैंने सोचा था कि प्रेमचंद का गाँव देखते ही शायद कोई असाधारण अनुभूति होगी। लेकिन सामने वही सामान्य भारतीय गाँव था—पक्के मकान, दुकानें, मोटरसाइकिलें, बिजली के खंभे, मोबाइल पर व्यस्त युवक। समय ने लमही को भी बदल दिया था।

एक क्षण को मन में हल्की निराशा हुई।

मैं शायद उस लमही को खोज रहा था जिसे मैंने प्रेमचंद के पन्नों में पढ़ा था—कच्चे रास्तों, खेतों, बैलगाड़ियों और मिट्टी की सोंधी गंध वाला लमही।

फिर लगा—यह अपेक्षा ही गलत है।

प्रेमचंद होते तो शायद वे भी आज के लमही को ही लिखते।

लेखक अतीत की तस्वीर नहीं बनाता; वह अपने समय का चेहरा पढ़ता है।

यही सोचते हुए मैं उस घर के सामने पहुँचा, जहाँ प्रेमचंद ने जन्म लिया था। घर साधारण था। इतना साधारण कि पहली दृष्टि में उसकी असाधारणता समझ में ही न आए।

मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।

यहीं से वह यात्रा शुरू हुई थी, जिसने आगे चलकर हिंदी साहित्य की दिशा बदल दी। इसी मिट्टी में वह बालक बड़ा हुआ, जिसने अभाव देखा, मनुष्य को समझा और फिर अपनी कलम से उन लोगों को आवाज दी जिन्हें समाज सुनना नहीं चाहता था।

मैंने आँखें बंद कीं।

जाने क्यों लगा, इस घर में आज भी बहुत-सी आवाजें बची हुई हैं।

किसान की। मजदूर की। स्त्री की। बच्चे की।

उस गरीब की, जिसके पास कहने को बहुत कुछ था, पर सुनने वाला कोई नहीं था।

प्रेमचंद ने उन्हें सुना था। इसीलिए उनकी कहानियाँ आज भी सुनाई देती हैं।

राजकीय समारोह शुरू हुआ। मंच पर प्रेमचंद का चित्र था। माल्यार्पण हुआ। साहित्यकारों ने उनके जीवन और साहित्य को याद किया। वक्ताओं ने उनकी भाषा, यथार्थवाद और सामाजिक सरोकारों की चर्चा की। वातावरण में सम्मान था, गरिमा थी और कहीं भीतर एक भावुकता भी।

लेकिन मेरे मन में समारोह से बड़ा एक प्रश्न उठ रहा था—क्या प्रेमचंद को श्रद्धांजलि देना केवल उन्हें याद करना है?

शायद नहीं।

प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम बार-बार अपने समय के सामने खड़े होते हैं।

हामिद आज भी है—बस उसका नाम बदल गया है।

होरी आज भी है—बस उसके खेत और उसकी समस्याओं का रूप बदल गया है।

धनिया आज भी है—बस उसकी लड़ाई के मोर्चे बदल गए हैं।

और ‘कफन’ के भीतर छिपी विडंबना भी हमारे समाज से पूरी तरह विदा नहीं हुई।

यही प्रेमचंद की ताकत है। वे पुराने नहीं पड़ते, क्योंकि उन्होंने अपने समय के बहाने मनुष्य को लिखा था।

समारोह के बाद हम कुछ साहित्यकार गाँव में निकले। शाम उतर रही थी। बच्चे खेल रहे थे। कहीं चूल्हे का धुआँ उठ रहा था। कोई बुजुर्ग चौखट पर बैठा था। दूर खेतों पर सूरज की आखिरी रोशनी ठहरी हुई थी।

मैंने सोचा—लमही बदल गया है, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई।

सड़क पर चलते हुए मुझे बार-बार लगता रहा कि प्रेमचंद के पात्र किसी पुस्तकालय में बंद नहीं हैं। वे हमारे बीच हैं। उन्हें पहचानना ही हमारी साहित्यिक शिक्षा की पहली शर्त है।

वापसी में बनारस फिर सामने था। शहर की रोशनियाँ जल चुकी थीं। घाटों पर आरती की तैयारी थी। घंटियों की ध्वनि हवा में तैर रही थी। गंगा शांत थी, जैसे दिन भर के सारे दृश्य अपने भीतर समेटे बैठी हो।

सुबह इसी बनारस से मैंने यात्रा शुरू की थी।

अब लौटते हुए लगा, बनारस और लमही दो अलग जगहें नहीं हैं।

एक ने मुझे जीवन का विराट रूप दिखाया था, दूसरे ने उसी जीवन के साधारण मनुष्य का चेहरा।

एक ओर गंगा थी, जो सबको अपने भीतर समेट लेती है; दूसरी ओर प्रेमचंद की मिट्टी, जिसने उन आवाजों को शब्द दिए जिन्हें समाज ने किनारे कर दिया था।

रात को होटल लौटकर मैंने डायरी खोली। दिन भर के दृश्य आँखों के सामने घूम रहे थे—मुंबई की भागती हुई रात, बनारस की सुबह, गंगा की धारा, गलियों की ठसक, कुल्हड़ की चाय, नाविक की पुकार, लमही की सड़क, प्रेमचंद का साधारण-सा घर और उस घर के सामने खड़ा मेरा अपना मन।

बहुत कुछ लिखना चाहता था। शब्द कम पड़ रहे थे।

अंततः केवल इतना लिख सका—“प्रेमचंद के गाँव से लौटना, प्रेमचंद से लौटना नहीं है।”

वे लमही में जन्मे थे, पर वहीं सीमित नहीं रहे। उनकी कलम ने उन्हें गाँव से निकालकर पूरे भारत का लेखक बना दिया। उन्होंने हमें केवल कहानियाँ नहीं दीं; उन्होंने हमें मनुष्य को देखने की दृष्टि दी।

मुंबई लौटते समय मेरे पास लमही की कोई निशानी नहीं थी। न मिट्टी की पोटली, न कोई स्मृति-चिह्न। बस एक जिम्मेदारी थी—उस दृष्टि को बचाए रखने की।

जब किसी साधारण मनुष्य में असाधारण गरिमा दिखाई दे, उसे अनदेखा न करने की। जब किसी कमजोर की आवाज दबती सुनाई दे, कान बंद न करने की। जब समाज किसी व्यक्ति को केवल उसकी गरीबी, जाति, पेशे या परिस्थिति से पहचानने लगे, तब उसके भीतर के मनुष्य को देखने की।

शायद यही प्रेमचंद को सच्ची श्रद्धांजलि है।

और शायद इसी कारण बनारस से लमही तक की यह छोटी-सी यात्रा मेरे लिए एक लंबी साहित्यिक यात्रा बन गई।

मैं प्रेमचंद की जन्मभूमि देखने गया था; लौटते समय लगा, प्रेमचंद मेरी दृष्टि में थोड़ा और जन्म ले चुके हैं।

आपने यात्रा पढ़ी और सुनी। अब अपनी यात्रा-वृत्तान्त लेखन यात्रा शुरू कीजिए।

✍️ अब लेखन की बारी

यात्रा को पढ़ना पहला कदम है; उसे अपनी भाषा में व्यक्त करना अगला।

लेखन अभ्यास 5 — यात्रा को शब्द दीजिए

आपने किसी ऐसे स्थान की यात्रा की है जिसका संबंध किसी प्रसिद्ध लेखक, साहित्यकार, कलाकार या ऐतिहासिक व्यक्तित्व से है। उस यात्रा का एक प्रभावी यात्रा-वृत्तान्त लिखिए।

अपने लेखन में ध्यान दें:
  • यात्रा के आरंभ और स्थान के वातावरण का सजीव चित्रण।
  • यात्रा में देखे गए दृश्य, लोग और घटनाएँ।
  • स्थानीय भाषा, संस्कृति अथवा जीवन की कोई विशेष झलक।
  • यात्रा के दौरान उत्पन्न आपकी व्यक्तिगत अनुभूति।
  • यात्रा-वृत्तान्त के अनुरूप प्रवाहपूर्ण और प्रभावी भाषा।
शब्द: 0

लेखन अभ्यास 6 — IGCSE लेखन चुनौती

आपको अपने प्रिय लेखक की जन्मभूमि पर आयोजित एक विशेष समारोह में सम्मिलित होने का अवसर मिला। यात्रा में अनेक साहित्यकार, लेखक और हिंदी-सेवी आपके साथ थे। इस पूरे अनुभव को एक प्रभावी यात्रा-वृत्तान्त के रूप में लिखिए।

शब्द सीमा: 120–160 शब्द

अपने लेखन में शामिल कीजिए:
  • यात्रा का आरंभ और स्थान का जीवंत वातावरण।
  • रास्ते और स्थान से जुड़े रोचक दृश्य।
  • लेखक की जन्मभूमि या स्मृति से जुड़ा अनुभव।
  • समारोह अथवा साथियों से जुड़ी कोई प्रभावी झलक।
  • यात्रा के अंत में आपकी व्यक्तिगत अनुभूति या विचार।
  • उपयुक्त मुहावरे, देशज/आंचलिक शब्द और प्रभावी वाक्य-विन्यास।
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