नागालैंड में चलती हैं ‘विश्वास की दुकानें’
सुनिए, पढ़िए, उत्तर दीजिए और अपने उत्तर की पुष्टि मूल पाठ के प्रमाण से कीजिए।
वाचन एवं पठन
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आज हमारे दैनिक जीवन में सुरक्षा और निगरानी सामान्य बात हो गई है। दुकानों में कैमरे लगे होते हैं, कार्यालयों में पहचान-पत्र जाँचे जाते हैं और ऑनलाइन भुगतान में बार-बार पहचान की पुष्टि करनी पड़ती है। इन व्यवस्थाओं के अपने कारण हैं, फिर भी एक प्रश्न उठता है—क्या समाज केवल निगरानी से सुरक्षित बनता है, या लोगों के बीच आपसी विश्वास भी उतना ही आवश्यक है? इस प्रश्न का रोचक उत्तर नागालैंड के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में दिखाई देता है। फेक जिले के फुत्सेरो में सड़क किनारे ऐसी छोटी दुकानें मिलती हैं, जिन्हें ‘ऑनेस्टी शॉप’ अर्थात ईमानदारी की दुकान कहा जाता है। स्थानीय किसान इनमें अपने खेतों की सब्जियाँ और फल रखते हैं। प्रत्येक वस्तु की कीमत लिखी होती है और भुगतान के लिए एक डिब्बा रखा रहता है। न कोई दुकानदार दिनभर वहाँ बैठता है और न ग्राहक पर निगरानी रखता है।
ऐसी ही एक दुकान चलाने वाली वेनेलु सुबह टमाटर, पत्तागोभी, अदरक और संतरे सजाकर अपने खेत चली जाती थी। इससे उसे दुकान और खेती में से किसी एक को चुनना नहीं पड़ता था और ग्राहक भी अपनी सुविधा से सामान खरीद सकते थे। एक दोपहर चौदह वर्षीय केविसेतुओ वहाँ पहुँचा। माँ ने उसे अदरक और दो पत्तागोभी लाने भेजा था। सामान उठाने के बाद उसने पैसे गिने तो वे कीमत से बीस रुपये कम थे। आसपास कोई नहीं था। वह कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, फिर एक पत्तागोभी वापस रख दी। उसने लिए गए सामान के पूरे पैसे डिब्बे में डाले और पास पड़े कागज पर लिखा—“बाकी सामान कल ले जाऊँगा।”
अगली सुबह उसी कागज के नीचे एक नई पंक्ति थी—“जरूरत हो तो ले जाओ, पैसे बाद में दे देना।” केविसेतुओ ने उसे पढ़ा, लेकिन सामान नहीं लिया। शाम को वह माँ के साथ लौटा, बाकी पत्तागोभी खरीदी और डिब्बे में बीस रुपये अतिरिक्त डाल दिए। वेनेलु ने उस शाम पैसे गिने तो अतिरिक्त राशि देखकर मुस्करा दी। उसने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि पैसे किसने रखे थे। अगले दिन उसने हमेशा की तरह दुकान सजाई और खेत चली गई। इन दुकानों से किसानों का समय बचता है और स्थानीय उपज सीधे ग्राहकों तक पहुँचती है। लेकिन इनकी सफलता केवल खरीद-बिक्री की सरल व्यवस्था में नहीं छिपी है। दुकानदार ग्राहक पर भरोसा करता है और ग्राहक उस भरोसे की जिम्मेदारी स्वीकार करता है।
हर स्थान पर बिना दुकानदार की दुकान खोल देना शायद संभव न हो, लेकिन नागालैंड का यह छोटा-सा प्रयोग एक बड़ी सीख देता है। नियम और निगरानी आवश्यक हो सकते हैं, पर विश्वास केवल कैमरे लगाकर पैदा नहीं किया जा सकता। वह तब बढ़ता है, जब किसी व्यक्ति को सही काम करने का अवसर मिले और वह बिना किसी डर के स्वयं सही रास्ता चुने। इसलिए इन दुकानों का महत्त्व केवल फल-सब्जियाँ बेचने तक सीमित नहीं है; वे यह दिखाती हैं कि समाज में विश्वास माँगने से पहले विश्वास करने का साहस भी आवश्यक है। शायद किसी समाज की सबसे मजबूत सुरक्षा वह विश्वास है, जिसकी रक्षा लोग स्वयं करते हैं।