यात्रा-वृत्तान्त पढ़िए और सुनिए
श्रवण + पठनमुंबई से बनारस की यात्रा मेरे लिए केवल एक शहर से दूसरे शहर तक पहुँचने की यात्रा नहीं थी। इस बार बनारस के आगे एक और यात्रा मेरा इंतज़ार कर रही थी—लमही की, उस मिट्टी की, जहाँ हिंदी के कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने जन्म लिया था। अवसर भी असाधारण था। प्रेमचंद की जन्म-जयंती पर लमही में राजकीय सम्मान के साथ आयोजित समारोह में देश के अनेक साहित्यकारों, लेखकों और हिंदी-सेवियों के साथ सम्मिलित होने का निमंत्रण मिला था।
मुंबई की भागती हुई रात से निकलकर बनारस की सुबह में पहुँचना अपने आप में जैसे समय की दो अलग-अलग धाराओं से गुजरना था। मुंबई में रात भी जागती रहती है; बनारस में सुबह जैसे धीरे-धीरे आँखें खोलती है। यहाँ दिन उगता नहीं, बनता है।
सुबह-सुबह घाटों की ओर निकला तो बनारस अपने पूरे ठाठ में सामने था। गंगा के ऊपर हलकी धुंध की चादर थी। नावें पानी को चीरती हुई आगे बढ़ रही थीं। घाट की सीढ़ियों पर कोई सूर्य को अर्घ्य दे रहा था, कोई मंत्रोच्चार में डूबा था, कोई चुपचाप गंगा को निहार रहा था। कहीं घंटियों की टुनक थी, कहीं शंख की ध्वनि; और इनके बीच चाय की दुकान से उठती आवाज—“बाबू, चाय ले लऽ।”
बनारस में शायद यही सबसे अद्भुत बात है—यहाँ आध्यात्म और रोजमर्रा का जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं चलते।
एक ओर आरती की तैयारी थी, दूसरी ओर कुल्हड़ में चाय छलक रही थी। कहीं कोई साधु धूनी रमाए बैठा था, तो थोड़ी दूर कोई रिक्शेवाला अपने दिन की पहली सवारी की बाट जोह रहा था। फूल बेचने वाला, नाविक, पुजारी, विद्यार्थी, पर्यटक, भिखारी, दुकानदार—सब अपने-अपने छोटे संसार लेकर उसी घाट पर उपस्थित थे।
गंगा सबको देख रही थी।
बनारस को समझना हो तो शायद उसकी गलियों में खो जाना चाहिए। संकरी गलियाँ, जिनमें दो लोग आमने-सामने से निकलें तो कंधे बचाने पड़ें; ऊपर झुकी पुरानी बालकनियाँ; दीवारों पर चिपके पोस्टर; कहीं अगरबत्ती की गंध, कहीं ताज़े पकौड़ों की महक; और हर मोड़ पर कोई नया दृश्य।
यहाँ रास्ते सीधे नहीं होते, पर जीवन सीधा दिखाई देता है।
एक गली से निकलो तो मंदिर। दूसरी से निकलो तो पान की दुकान। तीसरी में साड़ी की दुकान। चौथी में कोई बूढ़ा चौखट पर बैठा दुनिया का हाल सुना रहा है। बनारस अपने आपको देखने के लिए आपको कभी रोकता नहीं; वह बस चलता रहता है और आप उसके पीछे-पीछे चलते हुए उसके अर्थ पकड़ते रहते हैं।
पान की दुकानों पर बनारसी ठसक थी और बातचीत में वह मिठास, जिसमें तंज भी अपनापन लगता है। कोई कह रहा था—“का गुरु, पहली बार आए हउवा?” और अगले ही क्षण ऐसा व्यवहार कि जैसे बरसों की पहचान हो।
बनारस की भाषा भी उसकी गलियों जैसी है—घुमावदार, चुटीली और जीवन से भरी हुई।
दोपहर तक शहर कुछ और रूप धर चुका था। गलियों में चहल-पहल बढ़ गई थी। दुकानों के पट खुल चुके थे। मंदिरों की घंटियाँ अब भी सुनाई दे रही थीं। घाटों पर पर्यटकों की भीड़ थी। नाविक अपनी नावों को आवाज दे रहे थे। ऊपर आसमान में धूप चढ़ आई थी, लेकिन गंगा के किनारे बैठते ही जैसे मन का ताप उतरने लगा।
मैं सोच रहा था—प्रेमचंद का बनारस कैसा रहा होगा?
जिस शहर ने सदियों से साधु और शिल्पी, पंडित और पथिक, राजा और रंक—सबको अपने भीतर जगह दी, उसी सांस्कृतिक भूगोल के पास एक ऐसा गाँव भी था, जहाँ से एक बालक आगे चलकर भारतीय समाज की कथा लिखने वाला था।
लमही अभी कुछ दूर था। लेकिन अब उसकी ओर जाने की इच्छा पहले से अधिक तीव्र हो गई थी।
हम दोपहर बाद बनारस से लमही की ओर निकले। शहर धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा। भीड़ कम हुई। सड़क कुछ खुली। पक्के मकानों की जगह खेत दिखाई देने लगे। बीच-बीच में पेड़ों की कतारें थीं। सड़क किनारे बैठे किसान, साइकिल से स्कूल जाते बच्चे, छोटी दुकानों पर जमा लोग—बनारस का शहरी शोर पीछे रह गया था और गाँव की अपनी लय सुनाई देने लगी थी।
मेरे साथ गाड़ी में कई साहित्यकार थे। प्रेमचंद की चर्चा फिर शुरू हो गई। कोई ‘गोदान’ की बात कर रहा था, कोई ‘कफन’ की। मैं खिड़की से बाहर देख रहा था।
अचानक लगा, जिन पात्रों को हम किताबों में पढ़ते हैं, वे इन्हीं रास्तों से होकर हमारे पास आए होंगे।
होरी शायद किसी खेत की मेड़ पर खड़ा था।
धनिया किसी आँगन में अपनी गृहस्थी सँभाल रही थी।
हामिद किसी मेले की ओर भाग रहा था।
और प्रेमचंद—वे शायद इन्हीं चेहरों को पढ़ रहे थे।
लमही की ओर बढ़ते हुए मेरे मन में यह बात साफ होती गई कि प्रेमचंद ने गाँव को केवल देखा नहीं था। उन्होंने गाँव को भीतर तक जिया था। इसीलिए उनकी रचनाओं में गाँव केवल पृष्ठभूमि नहीं बनता; वह स्वयं एक पात्र बन जाता है।
कुछ ही देर में लमही आ गया।
मैंने सोचा था कि प्रेमचंद का गाँव देखते ही शायद कोई असाधारण अनुभूति होगी। लेकिन सामने वही सामान्य भारतीय गाँव था—पक्के मकान, दुकानें, मोटरसाइकिलें, बिजली के खंभे, मोबाइल पर व्यस्त युवक। समय ने लमही को भी बदल दिया था।
एक क्षण को मन में हल्की निराशा हुई।
मैं शायद उस लमही को खोज रहा था जिसे मैंने प्रेमचंद के पन्नों में पढ़ा था—कच्चे रास्तों, खेतों, बैलगाड़ियों और मिट्टी की सोंधी गंध वाला लमही।
फिर लगा—यह अपेक्षा ही गलत है।
प्रेमचंद होते तो शायद वे भी आज के लमही को ही लिखते।
लेखक अतीत की तस्वीर नहीं बनाता; वह अपने समय का चेहरा पढ़ता है।
यही सोचते हुए मैं उस घर के सामने पहुँचा, जहाँ प्रेमचंद ने जन्म लिया था। घर साधारण था। इतना साधारण कि पहली दृष्टि में उसकी असाधारणता समझ में ही न आए।
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।
यहीं से वह यात्रा शुरू हुई थी, जिसने आगे चलकर हिंदी साहित्य की दिशा बदल दी। इसी मिट्टी में वह बालक बड़ा हुआ, जिसने अभाव देखा, मनुष्य को समझा और फिर अपनी कलम से उन लोगों को आवाज दी जिन्हें समाज सुनना नहीं चाहता था।
मैंने आँखें बंद कीं।
जाने क्यों लगा, इस घर में आज भी बहुत-सी आवाजें बची हुई हैं।
किसान की। मजदूर की। स्त्री की। बच्चे की।
उस गरीब की, जिसके पास कहने को बहुत कुछ था, पर सुनने वाला कोई नहीं था।
प्रेमचंद ने उन्हें सुना था। इसीलिए उनकी कहानियाँ आज भी सुनाई देती हैं।
राजकीय समारोह शुरू हुआ। मंच पर प्रेमचंद का चित्र था। माल्यार्पण हुआ। साहित्यकारों ने उनके जीवन और साहित्य को याद किया। वक्ताओं ने उनकी भाषा, यथार्थवाद और सामाजिक सरोकारों की चर्चा की। वातावरण में सम्मान था, गरिमा थी और कहीं भीतर एक भावुकता भी।
लेकिन मेरे मन में समारोह से बड़ा एक प्रश्न उठ रहा था—क्या प्रेमचंद को श्रद्धांजलि देना केवल उन्हें याद करना है?
शायद नहीं।
प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम बार-बार अपने समय के सामने खड़े होते हैं।
हामिद आज भी है—बस उसका नाम बदल गया है।
होरी आज भी है—बस उसके खेत और उसकी समस्याओं का रूप बदल गया है।
धनिया आज भी है—बस उसकी लड़ाई के मोर्चे बदल गए हैं।
और ‘कफन’ के भीतर छिपी विडंबना भी हमारे समाज से पूरी तरह विदा नहीं हुई।
यही प्रेमचंद की ताकत है। वे पुराने नहीं पड़ते, क्योंकि उन्होंने अपने समय के बहाने मनुष्य को लिखा था।
समारोह के बाद हम कुछ साहित्यकार गाँव में निकले। शाम उतर रही थी। बच्चे खेल रहे थे। कहीं चूल्हे का धुआँ उठ रहा था। कोई बुजुर्ग चौखट पर बैठा था। दूर खेतों पर सूरज की आखिरी रोशनी ठहरी हुई थी।
मैंने सोचा—लमही बदल गया है, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
सड़क पर चलते हुए मुझे बार-बार लगता रहा कि प्रेमचंद के पात्र किसी पुस्तकालय में बंद नहीं हैं। वे हमारे बीच हैं। उन्हें पहचानना ही हमारी साहित्यिक शिक्षा की पहली शर्त है।
वापसी में बनारस फिर सामने था। शहर की रोशनियाँ जल चुकी थीं। घाटों पर आरती की तैयारी थी। घंटियों की ध्वनि हवा में तैर रही थी। गंगा शांत थी, जैसे दिन भर के सारे दृश्य अपने भीतर समेटे बैठी हो।
सुबह इसी बनारस से मैंने यात्रा शुरू की थी।
अब लौटते हुए लगा, बनारस और लमही दो अलग जगहें नहीं हैं।
एक ने मुझे जीवन का विराट रूप दिखाया था, दूसरे ने उसी जीवन के साधारण मनुष्य का चेहरा।
एक ओर गंगा थी, जो सबको अपने भीतर समेट लेती है; दूसरी ओर प्रेमचंद की मिट्टी, जिसने उन आवाजों को शब्द दिए जिन्हें समाज ने किनारे कर दिया था।
रात को होटल लौटकर मैंने डायरी खोली। दिन भर के दृश्य आँखों के सामने घूम रहे थे—मुंबई की भागती हुई रात, बनारस की सुबह, गंगा की धारा, गलियों की ठसक, कुल्हड़ की चाय, नाविक की पुकार, लमही की सड़क, प्रेमचंद का साधारण-सा घर और उस घर के सामने खड़ा मेरा अपना मन।
बहुत कुछ लिखना चाहता था। शब्द कम पड़ रहे थे।
अंततः केवल इतना लिख सका—“प्रेमचंद के गाँव से लौटना, प्रेमचंद से लौटना नहीं है।”
वे लमही में जन्मे थे, पर वहीं सीमित नहीं रहे। उनकी कलम ने उन्हें गाँव से निकालकर पूरे भारत का लेखक बना दिया। उन्होंने हमें केवल कहानियाँ नहीं दीं; उन्होंने हमें मनुष्य को देखने की दृष्टि दी।
मुंबई लौटते समय मेरे पास लमही की कोई निशानी नहीं थी। न मिट्टी की पोटली, न कोई स्मृति-चिह्न। बस एक जिम्मेदारी थी—उस दृष्टि को बचाए रखने की।
जब किसी साधारण मनुष्य में असाधारण गरिमा दिखाई दे, उसे अनदेखा न करने की। जब किसी कमजोर की आवाज दबती सुनाई दे, कान बंद न करने की। जब समाज किसी व्यक्ति को केवल उसकी गरीबी, जाति, पेशे या परिस्थिति से पहचानने लगे, तब उसके भीतर के मनुष्य को देखने की।
शायद यही प्रेमचंद को सच्ची श्रद्धांजलि है।
और शायद इसी कारण बनारस से लमही तक की यह छोटी-सी यात्रा मेरे लिए एक लंबी साहित्यिक यात्रा बन गई।
मैं प्रेमचंद की जन्मभूमि देखने गया था; लौटते समय लगा, प्रेमचंद मेरी दृष्टि में थोड़ा और जन्म ले चुके हैं।
✍️ अब लेखन की बारी
यात्रा को पढ़ना पहला कदम है; उसे अपनी भाषा में व्यक्त करना अगला।
लेखन अभ्यास 5 — यात्रा को शब्द दीजिए
आपने किसी ऐसे स्थान की यात्रा की है जिसका संबंध किसी प्रसिद्ध लेखक, साहित्यकार, कलाकार या ऐतिहासिक व्यक्तित्व से है। उस यात्रा का एक प्रभावी यात्रा-वृत्तान्त लिखिए।
अपने लेखन में ध्यान दें:- यात्रा के आरंभ और स्थान के वातावरण का सजीव चित्रण।
- यात्रा में देखे गए दृश्य, लोग और घटनाएँ।
- स्थानीय भाषा, संस्कृति अथवा जीवन की कोई विशेष झलक।
- यात्रा के दौरान उत्पन्न आपकी व्यक्तिगत अनुभूति।
- यात्रा-वृत्तान्त के अनुरूप प्रवाहपूर्ण और प्रभावी भाषा।
लेखन अभ्यास 6 — IGCSE लेखन चुनौती
आपको अपने प्रिय लेखक की जन्मभूमि पर आयोजित एक विशेष समारोह में सम्मिलित होने का अवसर मिला। यात्रा में अनेक साहित्यकार, लेखक और हिंदी-सेवी आपके साथ थे। इस पूरे अनुभव को एक प्रभावी यात्रा-वृत्तान्त के रूप में लिखिए।
शब्द सीमा: 120–160 शब्द
अपने लेखन में शामिल कीजिए:- यात्रा का आरंभ और स्थान का जीवंत वातावरण।
- रास्ते और स्थान से जुड़े रोचक दृश्य।
- लेखक की जन्मभूमि या स्मृति से जुड़ा अनुभव।
- समारोह अथवा साथियों से जुड़ी कोई प्रभावी झलक।
- यात्रा के अंत में आपकी व्यक्तिगत अनुभूति या विचार।
- उपयुक्त मुहावरे, देशज/आंचलिक शब्द और प्रभावी वाक्य-विन्यास।
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