बुधवार, 27 मई 2026

माणभट्ट लोककला

माणभट्ट लोककला और पद्मश्री धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या | IndiCoach

माणभट्ट लोककला

गुजरात की जीवित आख्यान परंपरा और पद्मश्री धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या की सांस्कृतिक साधना

कभी-कभी किसी गाँव की साँझ में दूर से आती थाप और झंकार पूरे वातावरण को बदल देती थी। चौपाल पर बैठा कथावाचक केवल कहानी नहीं सुनाता था, बल्कि लोकजीवन की स्मृतियों को जीवित कर देता था। गुजरात की “माणभट्ट” लोककला ऐसी ही विलक्षण आख्यान परंपरा है, जिसमें कथा, संगीत, अभिनय और लोकबुद्धि का अद्भुत संगम दिखाई देता है।¹

“लोककलाएँ केवल अतीत की वस्तु नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक स्मृति होती हैं।” — कपिला वात्स्यायन²

माणभट्ट कला : लोकजीवन की धड़कन

माणभट्ट गुजरात की प्राचीन लोककथात्मक परंपरा है, जिसमें कलाकार पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक कथाओं को संगीतात्मक शैली में प्रस्तुत करता है। यह कला गाँवों की चौपालों, पोलों और ओटलों पर सामूहिक संवाद का माध्यम रही है।³

धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या

पद्मश्री धार्मिकलाल चुन्नीलाल पंड्या इस परंपरा के प्रमुख संवाहक माने जाते हैं। उन्होंने दशकों तक अपनी साधना से इस लोककला को जीवित रखा। आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच उनका योगदान भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।⁴

लोककला और शिक्षा

माणभट्ट कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकशिक्षा का माध्यम भी रही है। इससे नैतिक मूल्य, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान पीढ़ियों तक पहुँचती रही।⁵

अध्ययन सामग्री

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🧠 माइंडमैप
📝 अभ्यास प्रश्न
  • माणभट्ट लोककला की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  • धार्मिकलाल पंड्या के योगदान पर टिप्पणी कीजिए।
  • लोककलाएँ समाज की सांस्कृतिक स्मृति कैसे बनती हैं?
  • मौखिक परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर विचार व्यक्त कीजिए।

निष्कर्ष

माणभट्ट लोककला भारतीय सांस्कृतिक चेतना की जीवित परंपरा है। यह हमें याद दिलाती है कि संस्कृति केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि उन आवाज़ों में भी बसती है जो पीढ़ियों तक समाज की स्मृतियों को जीवित रखती हैं।

संदर्भ / फुटनोट

¹ भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय लोकसाहित्य की रूपरेखा

² कपिला वात्स्यायन, Traditions of Indian Folk Arts

³ हसु याज्ञिक, Folklore of Gujarat

⁴ भारत सरकार, पद्मश्री सम्मान संबंधी सांस्कृतिक विवरण।

⁵ डॉ. गणेश देवी, भारतीय मौखिक परंपराओं पर शोध सामग्री।

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