सोमवार, 25 मई 2026

अबाबील का घर.. (ababill)

उनका घर भी... घर था | अबाबील और इंसान का मार्मिक एकालाप | IndiCoach

उनका घर भी...
घर था

एक अबाबील, एक इंसान और अनजाने में उजड़ते आशियाने की मार्मिक कथा

🎧 एकालाप सुनें

तुम… फिर आ गए?

सुबह से देख रहा हूँ… कभी उस बंद हो चुके कोटर के पास बैठते हो, कभी उड़कर सामने वाले बिजली के तार पर जा बैठते हो… और फिर उसी जगह लौट आते हो, जहाँ कभी तुम्हारा घर हुआ करता था।

काश… मैं तुम्हारी भाषा समझ पाता।

तुम शायद पूछ रहे होगे — “हमारा घर कहाँ गया?”

मैं क्या जवाब दूँ? क्या कहूँ कि मैंने अपना घर सुंदर बनवाने के चक्कर में तुम्हारा संसार उजाड़ दिया?

दीवारों पर नया प्लास्टर चढ़ रहा था… मिस्त्री एक-एक छेद बंद करता जा रहा था… और मैं बस अपने सपनों का घर बनते देख रहा था।

मुझे कहाँ पता था कि उन दीवारों की दरारों में सिर्फ ईंट और सीमेंट नहीं, किसी का जीवन भी बसा है।

तुम जब छोटे-छोटे तिनके लाते थे, पत्थर के कण, सूखे पत्ते, कपड़े के धागे… तो घर के लोग अक्सर झुंझला जाते थे।

लेकिन आज… वही बिखरे तिनके मेरे भीतर कांटे बनकर चुभ रहे हैं।

तुम्हारी कई पीढ़ियाँ मैंने इसी कोटर में देखी हैं। नन्हे बच्चे… जो पहले डरते-डरते घोंसले से झाँकते थे, फिर एक दिन पूरा आसमान नापने निकल पड़ते थे।

तुमने कभी मुझसे कुछ नहीं माँगा। बस दीवार का एक छोटा-सा कोना।

और मैं… वह भी तुमसे छीन बैठा।

आज जब तुम दोनों उस बंद जगह को टकटकी लगाकर देखते हो, तो ऐसा लगता है मानो कोई बेघर इंसान अपने उजड़े मकान के सामने खड़ा हो।

तुम बोल नहीं सकते, इसलिए तुम्हारा दुःख और बड़ा हो जाता है।

जब इंसान उजड़ता है तो अदालत जाता है… शिकायत करता है… रो लेता है… पर तुम?

तुम्हारी अदालत कहाँ है?

आज पहली बार मुझे एहसास हुआ कि पृथ्वी केवल इंसानों की नहीं है।

इन दीवारों पर जितना हक मेरा है, उतना ही तुम्हारा भी।

हम अपने शहर ऊँचे करते जा रहे हैं, पर आकाश खाली होता जा रहा है।

पेड़ कट रहे हैं… पुराने घरों की मुंडेरें गायब हो रही हैं… खुले आँगन सीमेंट में बदल रहे हैं… और तुम्हारे जैसे पक्षी धीरे-धीरे हमारी दुनिया से लुप्त होते जा रहे हैं।

जब अबाबीलें कम होती हैं, तो हवा बदलती है। कीट बढ़ते हैं। मौसम का संतुलन बिगड़ता है।

ये छोटी-सी चिड़ियाँ सिर्फ घोंसले नहीं बनातीं… धरती की साँसों को संतुलित रखती हैं।

मैंने मिस्त्री से कह दिया है… बारजे के ऊपर एक जगह खुली छोड़ देना।

शायद तुम लौट आओ।

शायद फिर भरोसा कर लो हम पर।

अब मैं हर नए घर को देखकर सिर्फ उसकी सुंदरता नहीं सोचूँगा… यह भी सोचूँगा कि उसमें किसी परिंदे के लिए एक छोटा-सा आसमान बचा है या नहीं।

क्योंकि… घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनते।

घर वे जगहें होती हैं जहाँ कोई निडर होकर लौट सके।

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✍️ अभ्यास प्रश्न

1. लेखक को सबसे अधिक अपराधबोध किस बात का हुआ?
2. “घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनते” — इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
3. अबाबील पक्षियों का पर्यावरणीय महत्व क्या है?
4. आधुनिक शहरीकरण से पक्षियों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
5. यदि आप लेखक की जगह होते तो पक्षियों के लिए क्या करते?

INDICOACH

सीख • संवेदना • संस्कृति

© Arvind Bari | Hindi Language & Literature

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