गुरुवार, 8 जनवरी 2026

प्रकृति में उगते मनुष्य - गुरु रवींद्रनाथ टैगोर

प्रकृति में उगते हैं मनुष्य – टैगोर का शिक्षा दर्शन | IGCSE | IBDP
रवींद्रनाथ टैगोर का शिक्षा दर्शन

प्रकृति में उगते हैं मनुष्य

— गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का शिक्षा-दर्शन

ब्राउज़र-आधारित | श्रवण परीक्षा हेतु उपयुक्त

"प्रकृति में उगते हैं मनुष्य" — यह कथन गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शिक्षा-दर्शन का सार है। टैगोर मानते थे कि शिक्षा यदि प्रकृति, स्वतंत्रता और सृजनशीलता से जुड़ी हो, तभी मनुष्य का सर्वांगीण विकास संभव है।

टैगोर का मूल विचार: शिक्षा जीवन से कटकर नहीं, जीवन से जुड़कर फलती-फूलती है।

वे उस औपनिवेशिक शिक्षा-प्रणाली के आलोचक थे जो रटंत, अनुशासन और परीक्षा को शिक्षा का केंद्र बनाती थी। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि मनुष्य बनाना है।

शांतिनिकेतन में पेड़ों के नीचे होने वाली कक्षाएँ इस विचार का व्यावहारिक रूप थीं। प्रकृति यहाँ केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सह-शिक्षक है।

टैगोर ने कला को शिक्षा का अनिवार्य अंग माना। उनके अनुसार संगीत, नृत्य और साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाते हैं।

उनका शिक्षा-दर्शन संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर विश्व-मानवता की बात करता है। इसी भावना से उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की — "जहाँ विश्व एक घर में मिले"।

IGCSE और IBDP जैसी आधुनिक वैश्विक शिक्षा प्रणालियों के संदर्भ में टैगोर का विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि यह शिक्षा को केवल करियर नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण से जोड़ता है।

📘 Learning Resources: टैगोर का शिक्षा दर्शन

📊 इन्फोग्राफिक देखें: टैगोर की शिक्षा प्रणाली

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🎥 वीडियो देखें: शांतिनिकेतन की शिक्षा

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🧠 माइंड मैप देखें: टैगोर का शिक्षा दर्शन

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📊 PPT देखें: Tagore's Educational Philosophy

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📚 संदर्भ / Citations

  1. Rabindranath Tagore, Shikshar Herpher, 1917
  2. Krishna Dutta & Andrew Robinson, 1995
  3. Visva-Bharati University Archives
  4. S. Radhakrishnan, Indian Philosophy, 1951

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