रविवार, 25 जनवरी 2026

लेख : कामकाजी जीवन में फँसी रसोईघर की अश्मिता

IGCSE 0549 Article Practice | कामकाजी जीवन और रसोई | IndiCoach
कामकाजी महिला और रसोई

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कामकाजी महिला का रसोईघर

रात के साढ़े दस बजे हैं। महानगर के एक फ्लैट में दरवाज़ा खुलता है। थकी हुई माँ जूते उतारती है, लैपटॉप सोफे पर रखती है और मोबाइल पर उँगली ठहर जाती है — "Order Now"। रसोई में रखा प्रेशर कुकर ठंडा है और फ्रिज पर चिपका बच्चों का चित्र मौन प्रश्नचिह्न बनकर पूछता है - 'क्या आज भी घर का खाना नहीं बनेगा?'

यहीं से एक बेचैन करने वाला प्रश्न जन्म लेता है — 'क्या आधुनिक कामकाजी महिलाओं के जीवन में रसोई अपनी अस्मिता खो रही है?'

भारतीय समाज में रसोई केवल भोजन पकाने की जगह नहीं,बल्कि संस्कार, संवाद और संवेदना का केंद्र रही है। "माँ के हाथों का स्वाद" वास्तव में स्वाद नहीं, सेहत, स्मृति और सुरक्षा का संगम है। घर का बना भोजन न केवल हमें स्वस्थ रखता है बल्कि, भावनात्मक संतुलन प्रदान करता है।

ऑनलाइन भोजन सुविधा देता है, पर पारिवारिक अपनापन नहीं। यह भोजन पेट भर सकता है, पर मन को तृप्त नहीं कर पाता

आज का कामकाजी जीवन समय की कमी से जूझ रहा है। लंबे कार्य-घंटे और ट्रैफिक के कारण खाना बनाने का समय सीमित हो गया है।

राष्ट्रीय समय-उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार शहरी परिवारों में घरेलू कार्यों का समय घटा है। विशेषकर महिलाओं के लिए यह स्थिति दो पाटों के बीच पिसने जैसी है।

यह कहना कि रसोई समाप्त हो रही है, एकांगी दृष्टि है। वास्तव में रसोई अपना रूप बदल रही है।

वीकेंड कुकिंग और साझा जिम्मेदारियाँ रसोई की नई पहचान हैं। समस्या तब होती है जब सुविधा संवेदना पर भारी पड़ जाती है

अतः रसोई की अस्मिता समाप्त नहीं हुई, बल्कि पुनर्परिभाषित हो रही है। यदि संतुलन साधा जाए, तो बंद कुकर फिर से सीटी बजा सकता है

📌 कैसे उपयोग करें

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  • भूमिका–विकास–निष्कर्ष स्पष्ट है
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