बीतते दौर की बारीक पड़ताल
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भारतीय समाज की आत्मा यदि कहीं सबसे सजीव रूप में दिखाई देती थी, तो वह संयुक्त परिवार की संरचना में थी। यह केवल एक छत के नीचे रहने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि पीढ़ियों से विकसित वह सामाजिक तंत्र था, जिसने व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक सुरक्षा, पहचान और अपनापन दिया¹। संयुक्त परिवार वस्तुतः भारत की सबसे प्रभावी अनौपचारिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली था — 'जहाँ पेंशन, बीमा या काउंसलिंग सेंटर की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, क्योंकि परिवार स्वयं ढाल बनकर खड़ा रहता था²।'
संयुक्त परिवार की पहली और सबसे बड़ी विशेषता थी — सामाजिक सुरक्षा। बीमार बुजुर्ग, बेरोज़गार युवा या नवजात शिशु — सबके लिए परिवार एक साझा उत्तरदायित्व निभाता था³। दूसरी विशेषता थी पीढ़ियों का संगम। दादा-दादी का अनुभव, माता-पिता का संघर्ष और बच्चों की जिज्ञासा—तीनों एक ही स्थान पर संवाद में रहते थे, जिससे संस्कारों का हस्तांतरण स्वाभाविक रूप से होता था⁴। तीसरी विशेषता थी सामूहिकता—चाहे खर्च हो या उत्सव, “मेरा” और “तेरा” नहीं, बल्कि “हमारा” का भाव प्रधान था। इसी कारण संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग होता था और जीवन अपेक्षाकृत सादा, पर संतुलित रहता था⁵। चौथी, और आज सबसे अधिक प्रासंगिक विशेषता थी मानसिक स्वास्थ्य। निरंतर संवाद, स्नेह और साथ होने के कारण अकेलापन, अवसाद या अस्तित्वगत असुरक्षा जैसी समस्याएँ विरल थीं⁶।
परंतु जैसे-जैसे बाजारवाद का विस्तार हुआ, संयुक्त परिवार उसके मार्ग में एक बड़ी बाधा बन गया। बाजार की मूल आवश्यकता है—अधिक से अधिक उपभोक्ता। जबकि संयुक्त परिवार व्यक्ति को उपभोक्ता से पहले सदस्य बनाता है⁷। इसलिए यह संयोग नहीं कि जब-जब परिवार टूटे, तब-तब बाजार फला-फूला। मीडिया के माध्यम से संयुक्त परिवारों को झगड़ों का केंद्र, स्वतंत्रता में बाधा और “आधुनिकता-विरोधी” दिखाया गया, जबकि एकल परिवार को स्वतंत्र, सफल और ग्लैमरस जीवनशैली के रूप में प्रस्तुत किया गया⁸।
इसका सीधा परिणाम उपभोक्तावाद के विस्फोट के रूप में सामने आया। जहाँ पहले एक घर, एक रसोई और एक वाहन पर्याप्त था, वहीं अब हर व्यक्ति के लिए अलग घर, अलग किचन और अलग सुविधा आवश्यक बना दी गई⁹। इससे भी गहरा प्रभाव पड़ा भावनाओं के व्यावसायीकरण में। नानी-दादी की ियों की जगह ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म आए, पारिवारिक संवाद की जगह स्क्रीन-टाइम ने ली और जो भावनात्मक सहारा पहले परिवार देता था, उसे अब “सब्सक्रिप्शन मॉडल” में बेचा जा रहा है¹⁰। कॉर्पोरेट जगत का लाभ भी इसी विघटन से जुड़ा है — जब कोई अकेला है, तभी ऑनलाइन शॉपिंग, फ़ूड-डिलीवरी और डिजिटल एंटरटेनमेंट सबसे अधिक बिकते हैं¹¹।
निष्कर्षतः, हमने आधुनिक बनने की होड़ में उस सामाजिक पूँजी को कमज़ोर कर दिया, जिसने सदियों तक हमें जोड़े रखा था। आज बुजुर्ग “बोझ” और बच्चे “स्क्रीन-यूज़र” बनते जा रहे हैं। समाधान अतीत में लौटना नहीं, बल्कि यह समझने में है कि संयुक्त परिवार कोई पिछड़ापन नहीं, बल्कि एक धरोहर के रूप में समझना है। बुजुर्गों का अनुभव किसी भी सर्च-इंजन से अधिक गहरा होता है और त्योहारों का उद्देश्य “सामान” नहीं, बल्कि “अपनापन” बढ़ाना होना चाहिए।
संयुक्त परिवार एक समय सुरक्षित किला की तरह था—जो अपने भीतर हर सदस्य को बाहरी खतरों और मानसिक तनाव से बचाता था। बाजारवाद ने यह कहकर उसकी दीवारें गिराईं कि खुली हवा में आज़ादी है, ताकि हर व्यक्ति को अलग-अलग डर, अलग-अलग ज़रूरत और अलग-अलग उत्पाद बेचे जा सकें। प्रश्न यह नहीं है कि हम आधुनिक हों या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या हम आधुनिकता की कीमत पर अपना सामाजिक आधार खोने को तैयार हैं?
संदर्भ
- Karve, I., Hindu Society: An Interpretation, 1961.
- Shah, A.M., The Family in India, 1998.
- Srinivas, M.N., Social Change in Modern India, 1966.
- NCERT, Indian Society, 2020.
- NFHS-5, Government of India, 2021.
- WHO, Mental Health and Social Support, 2019.
- Polanyi, K., The Great Transformation, 1944.
- Thussu, D.K., Media on the Move, 2007.
- Bauman, Z., Consuming Life, 2007.
- Turkle, S., Alone Together, 2011.
- Ritzer, G., The McDonaldization of Society, 2018.
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📌 मुख्य संदेश
बाज़ार संस्कृति ने भारतीय संयुक्त परिवार को जानबूझकर तोड़ा है ताकि अधिक उपभोक्ता बनाए जा सकें। परिणामस्वरूप समाज में अकेलापन, मानसिक तनाव और सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
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इंडीकोच संवाद
संयुक्त परिवार, समाज और बाजार संस्कृति पर एक गंभीर विमर्श
संयुक्त परिवार एक बरगद के विशाल पेड़ की तरह होता है, जिसकी जड़ें हमें जमीन से जोड़े रखती हैं और जिसकी छाया में जीवन सुरक्षित रहता है; जबकि एकल परिवार गमले के पौधे की तरह है - आकर्षक तो दिखता है, पर होता है - अस्थिर।
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