📖 विचारों का विरोध, आत्माओं का संवाद
📰 मूल आलेख
जब मैं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का स्मरण करता हूँ, तो मेरे भीतर एक अद्भुत विनय जाग उठता है। यह स्मरण किसी समकालीन का नहीं, उस आत्मा का है, जो मुझसे मिलने से बहुत पहले ही विश्व की चेतना में प्रतिष्ठित हो चुकी थी। सन् 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर गुरुदेव पहले ही विश्वकवि बन चुके थे, जब मैं दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत की मिट्टी को फिर से टटोल रहा था। उनसे मेरी पहली भेंट के समय वे कीर्ति के शिखर पर थे, और मैं अभी सेवा के पथ पर अपने साधारण कदम रख रहा था।
मेरे जीवन में अनेक क्षण ऐसे आए, जब सत्य का मार्ग काँटों से भरा लगा। उन दिनों गुरुदेव की कविताएँ मुझे भीतर से थाम लेती थीं। उनके शब्दों में कोई आदेश नहीं था, कोई आग्रह नहीं था — बस एक शांत आमंत्रण था, स्वयं से मिलने का। वे मुझे याद दिलाते थे कि स्वतंत्रता केवल जंजीरें तोड़ने का नाम नहीं, बल्कि भय, घृणा और संकीर्णता से मुक्त होने की साधना है। गुरुदेव ने मुझे ‘महात्मा’ कहा। यह शब्द मेरे लिए भारी था — इतना भारी कि कई बार मैं उसके बोझ से दब सा जाता था। मैं स्वयं को उस संबोधन के योग्य नहीं मानता था। पर जब मैं गुरुदेव की आँखों में देखता, तो लगता कि वे मुझसे किसी सिद्ध पुरुष की अपेक्षा नहीं कर रहे, बल्कि एक सजग, ईमानदार मनुष्य की आशा कर रहे हैं। शायद वही उनकी महानता थी — वे मनुष्य की दुर्बलता को भी स्वीकार करते थे।
हमारे बीच मतभेद थे। राष्ट्र, राजनीति और जनभावना के प्रश्नों पर वे मुझे सावधान करते थे। वे कहते थे कि कहीं ऐसा न हो कि हम स्वतंत्रता के नाम पर मनुष्य को ही भूल जाएँ। उनकी यह पीड़ा मुझे भीतर तक छू जाती थी। मैंने जाना कि उनका विरोध, वास्तव में, भारत के भविष्य के लिए एक गहरी चिंता थी। 1919 के जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के बाद जब गुरुदेव ने 'नाइटहुड' की उपाधि लौटा दी, तब यह स्पष्ट हो गया कि कविता और कर्म का स्रोत एक ही नैतिक भूमि से निकलता है।
शांतिनिकेतन की कल्पना मुझे आज भी आंदोलित करती है — जहाँ शिक्षा किसी इमारत में बंद नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में साँस लेती है। गुरुदेव चाहते थे कि मनुष्य पहले मनुष्य बने, फिर नागरिक। मैं भी यही चाहता था, पर मेरे मार्ग में संघर्ष अधिक था, उनका मार्ग गीतों से भरा था।
इन दोनों धाराओं को जोड़ने वाले हमारे प्रिय काका कालेलकर थे। वे मेरे मौन को समझते थे और गुरुदेव की कविता की धड़कन को भी। कालेलकर जी ने मुझे बताया कि गुरुदेव मेरे कठोर व्रतों के भीतर छिपी करुणा को देख पाते थे, और मैं उनके गीतों में छिपे सत्य को।
आज जब गुरुदेव स्मृति बनकर मेरे भीतर उतरते हैं, तो मैं अनुभव करता हूँ — यदि मेरे जीवन में संघर्ष ने दिशा दी, तो गुरुदेव ने उसे आत्मा दी। उनके बिना मेरा सत्य अधूरा होता, और मेरा भारत भी।
- लेख के अनुसार, गांधी की नज़र में टैगोर की मुख्य विशेषता क्या थी?
- 'गुरुदेव' संबोधन का प्रयोग गांधी ने क्यों किया?
- टैगोर को राष्ट्रवाद के बारे में क्या चिंता थी?
- शांतिनिकेतन की शिक्षा-व्यवस्था की क्या विशेषता थी?
- काका कालेलकर की क्या भूमिका रही?
- लेख को 2-3 बार ध्यानपूर्वक पढ़ें।
- मुख्य विचारों को अलग से नोट करें।
- 30-40 शब्दों में संक्षिप्त रहें।
- "कविता और कर्म का स्रोत एक ही नैतिक भूमि से निकलता है।" इस कथन को लेख के संदर्भ में समझाइए। यह किन घटनाओं से सिद्ध होता है?
- गांधी और टैगोर के विचारों में असहमति थी, फिर भी उनमें गहरा सम्मान क्यों था? लेख के आधार पर व्याख्या कीजिए।
- 'महात्मा' संबोधन गांधी के लिए आत्मपरीक्षण का कारण क्यों बना? इससे उनके व्यक्तित्व के बारे में क्या पता चलता है?
- उदाहरणों के साथ विस्तार से समझाएँ।
- लेख के प्रमुख विचारों को जोड़ें।
- 60-80 शब्दों की सीमा में रहें।
- लेखक कहते हैं—"यदि मेरे जीवन में संघर्ष ने दिशा दी, तो गुरुदेव ने उसे आत्मा दी।" इस कथन का गहरा अर्थ क्या है?
- क्या आप मानते हैं कि वैचारिक असहमति आत्मिक दूरी का कारण बन सकती है? इस लेख के आधार पर अपना तर्क प्रस्तुत कीजिए।
- गांधी-टैगोर का संवाद भारत की सच्ची धरोहर कैसे है? आधुनिक भारत के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।
- अपने विचारों को तर्कसहित प्रस्तुत करें।
- समकालीन संदर्भ जोड़ें।
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- जाग्रत अंतरात्मा — (लेख में इसका प्रयोग किसके लिए किया गया है?)
- संकीर्णता — (किन विचारों को संकीर्ण कहा गया है?)
- नरसंहार — (किस घटना को यह कहा गया है?)
- नैतिक भूमि — (यह किन कार्यों के लिए आवश्यक है?)
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- "विश्वपटल पर प्रतिष्ठित होना" — इससे क्या तात्पर्य है?
- "असहमति को विरोध नहीं, चेतावनी की तरह स्वीकार करना" — इसका क्या अभिप्राय है?
- "वैचारिक विरोध आत्मिक दूरी नहीं था" — इस कथन से क्या बोध होता है?
- परिचय : विषय को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करें।
- मुख्य भाग : 2-3 पैराग्राफ में विस्तार दें।
- निष्कर्ष : मुख्य विचारों को संक्षेप में बाँधें।
संकेत : कविता के माध्यम से चेतना जागरण, कर्म के माध्यम से समाज परिवर्तन, नैतिकता का आधार
- समझ (40%) : क्या आप लेख को सही से समझे हैं?
- विश्लेषण (35%) : क्या आप गहरे अर्थ को पकड़ पाए हैं?
- अभिव्यक्ति (25%) : क्या आपने अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त किए हैं?
