शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कपड़े की थैलियां, बन रही है पर्यावरण हितकारी Cloth bag

क्या कपड़े का थैला इस्तेमाल करने से वाकई हम पर्यावरण रक्षक बन सकते हैं?

IGCSE / IBDP Band-9 Academic Article • By Arvind Bari | IndiCoach

आज का युग सुविधा और आकर्षण का युग है। हम ऐसे विकल्पों की ओर सहज ही आकर्षित हो जाते हैं जो दिखने में सुंदर हों, उपयोग में आसान हों और आधुनिक जीवनशैली के अनुरूप हों। प्लास्टिक की थैलियाँ इसी मानसिकता का परिणाम हैं। वे हल्की, सस्ती, रंग-बिरंगी और हर दुकान पर आसानी से उपलब्ध होती हैं। इन्हें हाथ में लेकर चलने से एक प्रकार का आधुनिक होने का एहसास भी होता है। यही कारण है कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान की जानकारी होते हुए भी लोग इनका प्रयोग करते रहते हैं।

परंतु क्या केवल आकर्षण और सुविधा ही हमारे चयन का आधार होना चाहिए? यही प्रश्न हमें कपड़े की थैलियों के महत्व पर सोचने के लिए प्रेरित करता है। कपड़े की थैलियाँ भले ही दिखने में उतनी चमकदार न हों, लेकिन वे हमें एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक होने का बोध कराती हैं। जब कोई व्यक्ति स्वयं कपड़े की थैली लेकर बाजार जाता है, तो यह केवल एक वस्तु का प्रयोग नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जागरूक सोच का परिचय होता है।

प्लास्टिक की थैलियाँ पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बन चुकी हैं। ये सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होतीं, नालियों को जाम करती हैं और पशु-पक्षियों के लिए घातक सिद्ध होती हैं। मिट्टी और जल प्रदूषण में भी इनकी भूमिका अत्यंत हानिकारक है। इसके विपरीत, कपड़े की थैलियाँ बार-बार उपयोग में लाई जा सकती हैं और दीर्घकाल में प्रकृति को कम क्षति पहुँचाती हैं। इस दृष्टि से कपड़े की थैली पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक छोटा किंतु प्रभावी कदम है।

हालाँकि यह कहना भी आवश्यक है कि केवल कपड़े की थैली का उपयोग करने से ही कोई व्यक्ति पूर्ण रूप से पर्यावरण रक्षक नहीं बन जाता। पर्यावरण संरक्षण एक व्यापक जिम्मेदारी है, जिसमें जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, कचरा प्रबंधन और उपभोग की आदतों में परिवर्तन जैसे अनेक पहलू शामिल हैं। फिर भी किसी बड़े परिवर्तन की शुरुआत छोटे प्रयासों से ही होती है, और कपड़े की थैली उसी सोच का प्रतीक है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, मैं इस कथन से काफी हद तक सहमत हूँ कि कपड़े का थैला इस्तेमाल करने से हम पर्यावरण रक्षक बनने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। यह न केवल हमारे व्यवहार में परिवर्तन लाता है, बल्कि हमारी सोच को भी अधिक उत्तरदायी बनाता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस छोटे से कदम को अपनाए, तो सामूहिक रूप से पर्यावरण संरक्षण का एक सशक्त आधार तैयार किया जा सकता है।

🟢 Exam Insight: Band-9 लेखन संरचना
🎯 यह लेख Band-9 क्यों है?
  • संतुलित दृष्टिकोण
  • आलोचनात्मक विश्लेषण
  • स्पष्ट निष्कर्ष

✍️ Answer-Writing Takeaways

  • बिंदुओं का विकास
  • Balanced opinion
  • सशक्त निष्कर्ष

📝 Interactive Practice

प्रश्न: छोटे व्यक्तिगत प्रयास सामाजिक परिवर्तन कैसे ला सकते हैं?

सुरखाब के पर : The ultimate wings

सुर्खाब के पर | प्रकृति, प्रतीक और स्मृति की उड़ान | IndiCoach

सुर्खाब के पर

प्रकृति, प्रतीक और स्मृति की उड़ान

लेखक: अरविंद बारी | IndiCoach

संध्या का समय है। झील के जल पर हल्की लहरें हैं और आकाश में ढलते सूर्य की सुनहरी आभा फैल रही है। दूर से एक जोड़ा आता हुआ दिखाई देता है — दो पक्षी, जिनके पंख हवा में फैले हैं और जिनकी उड़ान में एक अजीब सी लय है, जैसे कोई पुरानी धुन हो। ये हैं सुर्खाब — वे पक्षी जो केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी कविताओं, कहानियों और लोकगीतों में भी जीवित हैं।


उड़ते समय सुर्खाब के पंखों में केसरिया, श्वेत और गहरे रंग की छाया दिखाई देती है। जब सूर्य की रोशनी इन पंखों पर पड़ती है, तो वे ऐसे चमकते हैं जैसे किसी चित्रकार ने प्रकृति के कैनवास पर रंग भर दिए हों। ये रंग केवल सुंदरता के लिए नहीं हैं — ये पहचान, संदेश और अस्तित्व की घोषणा हैं।

हिंदी साहित्य में सुर्खाब को चकवा और चकवी के रूप में भी जाना जाता है। लोककथाओं में कहा जाता है कि रात में ये दोनों अलग हो जाते हैं और सुबह फिर मिलते हैं। यह कथा प्रेम और विरह का प्रतीक बन गई है। कवियों ने इसे अनगिनत बार अपनी रचनाओं में स्थान दिया है।

"सुर्खाब के पर" का उपयोग उर्दू और हिंदी कविता में असंभव या दुर्लभ वस्तु के रूपक के लिए होता है — जैसे कुछ ऐसा जो सुंदर तो हो, पर पाना कठिन।


वैज्ञानिक दृष्टि से सुर्खाब Ruddy Shelduck या Brahminy Duck के नाम से जाना जाता है। ये प्रवासी पक्षी हैं जो सर्दियों में भारत आते हैं। इनकी उड़ान लंबी और नियमित होती है — ये हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं, पीढ़ी दर पीढ़ी वही मार्ग अपनाते हैं। इनकी यह यात्रा न केवल जैविक आवश्यकता है, बल्कि प्रकृति के अदृश्य नियमों का पालन भी है।

रोचक तथ्य

• सुर्खाब जोड़े में रहते हैं और जीवनभर एक ही साथी के प्रति वफादार रहते हैं

• इनकी आवाज़ तेज़ और विशिष्ट होती है, जो दूर से ही सुनाई देती है

• ये झीलों, नदियों और जलाशयों के किनारे घोंसला बनाते हैं

सुर्खाब के पंख केवल उड़ने के साधन नहीं, बल्कि प्रतीक हैं — स्वतंत्रता, गति और दूरियों को पार करने की क्षमता के। जब ये पक्षी उड़ते हैं, तो उनके पंख हवा को काटते हैं और एक लय बनाते हैं। यह लय प्रकृति की संगीत की तरह होती है — बिना शब्दों के, बिना भाषा के।


आज जब हम शहरों में रहते हैं, जहाँ आकाश में बिल्डिंगें हैं और झीलें सिकुड़ रही हैं, तब सुर्खाब की उड़ान हमें याद दिलाती है कि प्रकृति अभी भी जीवित है। उनके पंखों में वह सब कुछ है जो हमने खो दिया है — खुलापन, स्वतंत्रता, और अपने रास्ते को जानने का विश्वास।

जब अगली बार आप किसी झील के किनारे जाएँ और आकाश में उड़ते सुर्खाब देखें, तो थोड़ा रुकें। उनके पंखों को देखें, उनकी उड़ान को महसूस करें। वे केवल पक्षी नहीं हैं — वे स्मृति, प्रतीक और प्रकृति की कविता हैं।

रविवार, 25 जनवरी 2026

लेख : कामकाजी जीवन में फँसी रसोईघर की अश्मिता

IGCSE 0549 Article Practice | कामकाजी जीवन और रसोई | IndiCoach
कामकाजी महिला और रसोई

Article Writing Practice

Interactive Content & Language Assessment

कामकाजी महिला का रसोईघर

रात के साढ़े दस बजे हैं। महानगर के एक फ्लैट में दरवाज़ा खुलता है। थकी हुई माँ जूते उतारती है, लैपटॉप सोफे पर रखती है और मोबाइल पर उँगली ठहर जाती है — "Order Now"। रसोई में रखा प्रेशर कुकर ठंडा है और फ्रिज पर चिपका बच्चों का चित्र मौन प्रश्नचिह्न बनकर पूछता है - 'क्या आज भी घर का खाना नहीं बनेगा?'

यहीं से एक बेचैन करने वाला प्रश्न जन्म लेता है — 'क्या आधुनिक कामकाजी महिलाओं के जीवन में रसोई अपनी अस्मिता खो रही है?'

भारतीय समाज में रसोई केवल भोजन पकाने की जगह नहीं,बल्कि संस्कार, संवाद और संवेदना का केंद्र रही है। "माँ के हाथों का स्वाद" वास्तव में स्वाद नहीं, सेहत, स्मृति और सुरक्षा का संगम है। घर का बना भोजन न केवल हमें स्वस्थ रखता है बल्कि, भावनात्मक संतुलन प्रदान करता है।

ऑनलाइन भोजन सुविधा देता है, पर पारिवारिक अपनापन नहीं। यह भोजन पेट भर सकता है, पर मन को तृप्त नहीं कर पाता

आज का कामकाजी जीवन समय की कमी से जूझ रहा है। लंबे कार्य-घंटे और ट्रैफिक के कारण खाना बनाने का समय सीमित हो गया है।

राष्ट्रीय समय-उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार शहरी परिवारों में घरेलू कार्यों का समय घटा है। विशेषकर महिलाओं के लिए यह स्थिति दो पाटों के बीच पिसने जैसी है।

यह कहना कि रसोई समाप्त हो रही है, एकांगी दृष्टि है। वास्तव में रसोई अपना रूप बदल रही है।

वीकेंड कुकिंग और साझा जिम्मेदारियाँ रसोई की नई पहचान हैं। समस्या तब होती है जब सुविधा संवेदना पर भारी पड़ जाती है

अतः रसोई की अस्मिता समाप्त नहीं हुई, बल्कि पुनर्परिभाषित हो रही है। यदि संतुलन साधा जाए, तो बंद कुकर फिर से सीटी बजा सकता है

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