मंगलवार, 2 सितंबर 2025

हमारी पहचान हमारे आस्था और मूल्यों में निहित है।

हमारी पहचान हमारे आस्था और मूल्यों में निहित है।

मनुष्य की पहचान केवल उसके भौतिक अस्तित्व या नाम तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसकी आस्थाएं और मूल्य ही उसे सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर एक विशिष्ट रूप प्रदान करते हैं। भारतीय चिंतन परंपरा में कहा गया है—“सत्यं वद, धर्मं चर।”1 इसका आशय यह है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप उसकी वाणी और कर्म में निहित मूल्यों से प्रकट होता है।

यदि हम प्राचीन काल की ओर देखें तो वैदिक सभ्यता से लेकर उपनिषदों और गीता तक, हर जगह मूल्यों और आस्थाओं का गहन प्रतिपादन हुआ है। उपनिषदों में "आत्मा" और "ब्रह्म" की अवधारणा न केवल दार्शनिक विमर्श रही, बल्कि जीवन को अर्थपूर्ण बनाने का मार्गदर्शन भी करती रही है। आचार्य शंकर से लेकर आचार्य अरविंद तक, सभी ने जीवन में आस्था और मूल्यों को सर्वोपरि माना।2

मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि आस्था केवल बाह्याचार नहीं है, बल्कि यह हृदय की निर्मलता और ईश्वर से व्यक्तिगत संबंध का माध्यम है। कबीर और मीरा जैसे संतों ने समाज में समानता, प्रेम और भक्ति के मूल्य स्थापित किए।

आज का युग वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का युग है। अनेक लोग यह मानते हैं कि विज्ञान और आस्था परस्पर विरोधी हैं, किंतु यह धारणा अधूरी है। विज्ञान जहां बाह्य जगत के रहस्यों को सुलझाता है, वहीं आस्था और मूल्य आंतरिक जगत को संतुलित करते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों जैसे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने यह कहा कि “विज्ञान और अध्यात्म में कोई विरोध नहीं है, दोनों मिलकर मानवता की भलाई करते हैं।”3

विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में भी इस विषय पर निरंतर शोध हो रहे हैं। ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे संस्थानों में "Ethics and Faith" पर गंभीर अध्ययन किया जा रहा है। भारतीय विश्वविद्यालयों में भी शोधकर्ता यह निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि मूल्यहीन प्रगति अंततः मानवता को संकट में डाल सकती है।4

इस प्रकार स्पष्ट है कि आस्थाएं और मूल्य केवल परंपरा या संस्कृति का अंश नहीं हैं, बल्कि वे जीवन की दिशा और पहचान निर्धारित करने वाली शक्तियां हैं। बिना मूल्यों के विकास केवल तकनीकी उन्नति होगी, किंतु मानवता का कल्याण अधूरा रह जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि आधुनिक शिक्षा और शोध में भी आस्था और मूल्य की प्रमुख भूमिका सुनिश्चित की जाए।

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